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शुक्रवार, 10 अप्रैल 2020

कक्षा 10, जीव विज्ञान पाठ-6 जैव प्रक्रम से सम्बंधित उपयोगी नोट्स

कक्षा 10, जीव विज्ञान पाठ-6 जैव प्रक्रम
जैव प्रक्रम- जीवों में जीवित रहने के लिए होने वाली समस्त क्रियाओं को जैव प्रक्रम कहते हैं। जैसे-श्‍वसन।
श्‍वसन- जीवों में होने वाली ऐसी क्रिया जिसमें ऑक्सीजन की उपस्थिति में गलूकोज का ऑक्सीकरण होता है। तथा कार्बन डाई ऑक्साइड, जल व ऊर्जा मुक्त होती हो श्‍वसन कहलाती है। C6H12O6 + 6CO2 + 686KCal
श्‍वसन की विशेषताएं
1. यह एक अपघटनी अभिक्रिया है।
2. श्‍वसन क्रिया में ऑक्सीजन ग्रहण की जाती है। तथा कार्बन डाई ऑक्साइड मुक्त की जाती है।
3. श्‍वसन क्रिया दिन व रात अथवा चौबीसों घंटे होती है।
4. यह सभी जीवित कोशिकाओं में होती है।
5. यह माइटोकॉन्ड्रिया के सहयोग से होती है।
श्‍वसन दो प्रकार का होता है-
1. वायवीय श्‍वसन- यह श्‍वसन ऑक्सीजन की उपस्थिति में होता है अत: इसे ऑक्सीश्वसन भी कहा जाता है। इस क्रिया में ग्लूकोज के पूर्ण ऑक्सीकरण से 686Kcal ऊर्जा, कार्बन डाई ऑक्साइड तथा जल का निर्माण होता है। यह ऑक्सीकरण माइटोकॉन्ड्रिया में होता है। जैसे मनुष्य में।
2. अवायवीय श्‍वसन- यह श्‍वसन ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में होता है अत: इसे अनाॅक्सीश्वसन भी कहा जाता है। इसमें गलूकोज के आंशिक ऑक्सीकरण से 21Kcal ऊर्जा, कार्बन डाई ऑक्साइड तथा एथिल एल्कोहॉल बनता है। यह क्रिया कोशिका के जीव द्रव्य में होती है। जैसे- यीष्ट, जीवाणुओं आदि में।
श्वसन की परिभाषा क्या है , इसके प्रकार , उदाहरण और मनुष्य के श्वसन तंत्र को जानने के लिए यहाँ क्लिक करें . 
पोषण- जीवों द्वारा विभिन्‍न पोषक पदार्थों जैसे - कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा, खनिज लवण, विटामिन आदि को ग्रहण करना एवं इन पोषक पदार्थों का उपयोग करना पोषण कहलाता है। पोषण दो प्रकार का होता है-
1. स्वपोषी पोषण
2. विषमपोषी अथवा परपोषी पोषण
1. स्वपोषी पोषण- पोषण की वह विधि जिसमें सजीव अपना भोजन पर्यावरण में उपस्थित सरल अकार्बनिक पदार्थों से स्वयं बनाते हैं, स्वपोषी पोषण कहलाता है। इन जीवों को स्वपोषी जीव कहा जाता है। जैसे- समस्त पेड़-पौधे। वह प्रक्रिया जिसमें हरे पेड़-पौधे सूर्य का प्रकाश एवं पर्णहरित की उपस्थिति में कार्बन डाई ऑक्साइड व जल ग्रहण कर ऑक्सीजन बनाते हों। प्रकाश संश्लेषण कहलाती है। यह क्रिया दिन में पर्णहरित की उपस्थिति में होती है। प्रकाश संश्लेषण के द्वारा पौधे अपना भोजन स्वयं बनाते हैं। इसीलिए पौधों को स्वपोषी भी कहते हैं। एवं इस पोषण को स्वपोषण कहते हैं।   6CO2 + 6H2O---->C6H12O6 + 6O2
स्वपोषी पोषण के लिए निम्न परिस्थितियां आवश्यक हैं-
(1) CO2 की उपस्थिति ।
(2) जल की उपस्थिति ।
(3) सूर्य के प्रकाश की उपस्थिति ।
(4) पर्णहरित की उपस्थिति ।
स्वपोषी पोषण का मुख्य उत्पाद गलूकोज तथा उपउत्पाद ऑक्सीजन होता है।
पेड़ - पौधे भोजन बनाने के लिए आवश्यक सामग्री कैसे प्राप्त करते हैं?- हम जानते हैं की पेड़-पौधों में भोजन बनाने का कार्य मुख्य रूप से पत्तियों द्वारा किया जाता है। पत्तियों में उपस्थित हरितलवक प्रकाश ऊर्जा का अवशोषण करते हैं। इन्हें क्लोरोप्लाष्ट भी कहते हैं। कार्बन डाई ऑक्साइड का अवशोषण पत्तियों एवं तने में उपस्थित रंध्रों द्वारा किया जाता है तथा जल एवं खनिज लवणों का अवशोषण जड़ों द्वारा किया जाता है। भोजन बनने के बाद इसे पौधे के विभिन्न भागों में भेज दिया जाता है। जिसके लिए संवहन ऊतक होते हैं। CAM पादपों में रन्ध्र केवल रात्रि में खुलते हैं। इन रंध्रों से ऑक्सीजन का भी निष्कासन होता है। इसके अलावा रंध्रों से पर्याप्त मात्रा में जल की भी हानि होती है। जब प्रकाश संश्लेषण के लिए कार्बन डाई ऑक्साइड की आवश्यकता नहीं होती है ये रंध्रों को बन्द कर लेते हैं। रंध्रों का खुलना एवं बन्द होना द्वार कोशिका का कार्य है। द्वार कोशिका में जब जल अन्दर जाता है तो यह फूल जाती है और रन्ध्र खुल जाता है।
2. विषमपोषी अथवा परपोषी पोषण-  वह पोषण जिसमें सजीव अपना भोजन स्वयं न बनाकर दूसरों पर निर्भर होते हैं विषमपोषी अथवा परपोषी पोषण कहलाता है। जैसे- समस्त जन्तु परपोषी पोषण करते हैं।
अप्रकाशित क्रिया- यह क्रिया प्रकाश की अनुपस्थिति अथवा रात में पर्णहरित के स्ट्रोमा भाग में होती है। इस क्रिया में ATP खर्च होती है व कार्बन डाई ऑक्साइड का अपचयन होता है।
पेड़-पौधों में वहन पौधों में वहन निम्न दो संवहन ऊतकों द्वारा होता है- 1.जायलम 2. फ्लोएम
जायलम और फ्लोएम
1. जायलम- यह सवंहनी ऊतक मृदा से खनिज लवणों का अवशोषण कर नीचे से ऊपर पहूँचाता है।
2.फ्लोएम- यह ऊतक पत्तियों द्वारा बनाए गये भोजन को नीचे तक पहुँचाता है।
मनुष्य में ऑक्सीजन व कार्बन डाई ऑक्साइड का परिवहन- मानव में श्वसन क्रिया के लिए सहायक व मुख्य श्वसन अंग पाए जाते हैं जो निम्न हैं-
(a) सहायक श्वसन अंग-
1. बाह्य नासा छिद्र।
2. कंठ।
3. श्वसन नली।
4. नासा मार्ग
(b) मुख्य श्वसन अंग-
एक जोड़ी फेफड़े।
मनुष्य में श्वसन की क्रियाविधि:
     हमारे शरीर में वायु नासा छिद्र व नासा मार्ग से होती हुई श्वासनली में तथा श्वासनली से फेफड़ों में प्रवेश कर जाती है। नासा छिद्र में उपस्थित रोम(बाल) तथा श्लेष्मा वायु में से धूल मि्ट्टी जैसी अशुद्धियों को रोक लेते हैं। श्वसननली वक्ष गुहा में आकर दो भागों में विभक्त हो जाती है। प्रत्येक भाग अपने ओर के फेफड़े में प्रवेश कर अनेक शाखाओं में बंट जाती है। और अन्त में यह गुब्बारे के समान फूल जाती है। जिन्हें कूपिकाएं कहते हैं ये कूपिकाएं गैसों का आदान प्रदान करती हैं। यहीं से ऑक्सीजन रुधिर में है और कार्बन डाई ऑक्साइड रुधिर से हट जाती है। तथा वापस निकल जाती है।
मनुष्य में पोषण:
    मनुष्य एक परपोषी प्राणी है। मुख में भोजन जाने के बाद उसे चबाया जाता है। साथ ही लार ग्रन्थियों से निकलने वाले लालारस को मिलाया जाता है। इस लाररस की प्रकृति क्षारीय होती है। लार में उपस्थित लार एमिलेस एन्जाइम मंड के जटिल अणुओं को शर्करा में तोड़ देता है। क्षारीय प्रकृति के कारण लार अम्लीय प्रकृति के रोगाणुओं की नष्ट कर देती है। इसके बाद भोजन को आमाशय में भेज दिया जाता है। आमाशय से हाइड्रोक्लोरिक अम्ल, पेप्सिन एन्जाइम, श्लेष्मा स्रावित होता है। जो भोजन में उपस्थित क्षारकीय प्रकृति के रोगाणुओं को नष्ट कर देता है।इसके बाद भोजन क्षुद्रांत्र में प्रवेश करता है। यह आहारनाल का सबसे लंबा भाग है मांसाहारी जीवों की तुलना में शाकाहारी जीवों की आहरनाल लंबी होती है। क्योंकि सेल्यूलोज पचाने के लिए अधिक लंबी आहारनाल की आवश्यकता होती है।
          क्षुद्रांत्र कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा के पाचन का स्थल होता है। यकृत से स्रावित पित्तरस रस भोजन को पुन: क्षारीय बना देता है जिस पर अग्नाश्य से निकलने वाले एन्जाइम क्रिया करते हैं। क्षुद्रांत्र में वसा की गोलिकाओं का खंडन पित्त लवण द्वारा किया जाता है। जिससे इन पर एन्जाइमों की क्रियाशीलता बढ़ जाती है।अग्नाश्य से स्रावित अग्न्याशयिक रस में ट्रिप्सिन एन्जाइम होता है। जो प्रोटीन का पाचन करता है। तथा इम्लसीकृत वसा के पाचन के लिए लाइपेज एन्जाइम होता है। क्षुद्रांत्र की भित्ती में उपस्थित ग्रंथि आंत्र रस स्रावित करती हैं इसमें उपस्थित एन्जाइम प्रोटीन को अमीनों अम्लों में, कार्बोहाइड्रेट को ग्लूकोज़ में तथा वसा को वसीय अम्ल तथा ग्लेसरोल में परिवर्तित कर देता है। इस पाचित भोजन को आंत्र के द्वारा अवशोषित किया जाता है। इसके लिए आंत्र में रोम पाये जाते हैं जो अवशोषण का सतही क्षेत्रफल बढ़ा देते हैं। इन दीर्घ रोमों से बहुत अधिक संख्या में रुधिर बहिकाएं जुडी होती हैं. जो अबशोषित भोजन को शरीर के विभिन्न अंगों तक पहुंचाती हैं जहाँ इसका उपयोग ऊर्जा प्राप्त करने, नये उत्तकों का निर्माण करने व पुराने उत्तकों की मरम्मत करने में किया जाता है.
     यहाँ से बिन पचे भोजन को बड़ी आंत में भेज दिया जाता है जहाँ उपस्थित दीर्घरोम जल का अवशोषण कर लेते हैं और एनी पदार्थ गुदा द्वारा मल के रूप में बाहर त्याग दिया जाता जिसका नियंत्रण गुदा अवरोधनी द्वारा क्या जाता है.
अमीबा में पोषण- हमारे शरीर में वहन रुधिर द्वारा किया जाता है। रुधिर एक तरल संयोजी ऊतक है। तथा रुधिर में एक तरल माध्यम होता है, जिसे प्लैज्मा कहते हैं। प्लैज्मा भोजन, कार्बन डाई ऑक्साइड तथा नाइट्रोजनी वर्ज्य पदार्थों का वहन करता है। तथा ऑक्सीजन का वहन लाल रुधिर कणिकाओं द्वारा किया जाता है। अत: इन सब के वहन के लिए एक पंपनयंत्र की आवश्यकता होती है।
हमारा पंप-हृदय- हृदय एक पेशीय अंग है। जो मुट्ठी के आकार का होता है।हमारा हृदय चार कोष्ठों में बंटा होता है। ताकि ऑक्सीजनित रुधिर विऑक्सीजनित में न मिल सके।  रुधिर को फेफड़ों में ऑक्सीजन को जोड़ना होता है। और कार्बन डाई ऑक्साइड को हटाना होता है। जब रुधिर फेफड़ों से अपने साथ ऑक्सीजन को जोड़ता है अथवा ऑक्सीजनित होता है तो यह हृदय के बायें आलिन्द में एकत्र होता है। इस दौरान यह शिथिल हो जाता है, तथा बायाँ आलिन्द संकुचित रहता है। इसके पश्चात एकत्र ऑक्सीजनित रुधिर बांयें आलिन्द से बांयें निलय मे प्रवेश करता है। इस दौरान बायाँ आलिन्द संकुचित हो जाता है तथा बायाँ निलय शिथिल हो जाता है। बांयें निलय की भित्ती मोटी होती है। जब यह संकुचित होता है तो ऑक्सीजनित रुधिर शरीर के सम्पूर्ण अंग तंत्रो तक पहुँच जाता है। इस प्रकार हमारा हृदय एक पंप की तरह कार्य करता है।
      हृदय से रुधिर जिन वाहिनियों से होते हुए विभिन्न अंग तंत्रों तक पहुँचता है, उन्हें धमनी कहते है। इनकी भित्ती भी मजबूत व लचीली होती है। क्योंकि रुधिर दाब से अधिक होने से फटने का डर होता है। विऑक्सीजनित (कार्बन डाइ ऑक्साइड युक्त रुधिर) रुधिर को विभिन्‍न अंग तंत्रो से जो रुधिर वाहिनियाँ वापस हृदय तक लाती हैं, उन्हें शिरा कहते हैं विऑक्सीजनित रुधिर विभिन्‍न अंग तंत्रों से आकर दायाँ आलिन्द में व दायाँ आलिन्द से दायाँ निलय में प्रवेश करता है। तथा दायाँ निलय से फेफड़ो में प्रवेश करता है। यहाँ से पुन: ऑक्सीजन रुधिर से जुड़ता है और वही चक्र पुन: शुरू हो जाता है। आपने देखा होगा कि विऑक्सीजनित रुधिर को ऑक्सीजनित होने के लिए दो बार हृदय से गुजरना पड़ा है। इसलिए इस तंत्र को दोहरापरिसंचरण तंत्र कहा जाता है।
प्लेटलैट्स द्वारा अनुरक्षण- प्लेटलेट्स हमारे पूरे शरीर में भ्रमण करती हैं, जब हम घायल हो जाते हैं तो रुधिर वाहिनियों के फटने से रुधिर स्राव होता है। इससे रुधिर की हानि होती है। तथा पंम्पिग दाब में कमी आती है। प्लैटलैट्स रुधिर स्रावित स्थान पर जाल बना लेती हैं। जिससे रुधिर का थक्का बन जाता है। और रूधिर का स्रावण रुक जाता है। तथा आक्रमण करने वाले रोगाणुओं को नष्ट कर अनुरक्षण का कार्य भी करती हैं। धीरे-धीरे घाव भर जाता है।
उत्सर्जन- वह जैव प्रक्रम जिसमें अपशिष्ट पदार्थों का निष्कासन होता है, उत्सर्जन कहलाता है।
मानव में उत्सर्जन- मानव के उत्सर्जन तंत्र में एक जोड़ी वृक्क, मूत्रवाहिनी, मूत्राशय तथा मूत्रमार्ग होता है। वृक्क उदर में रीढ़ की हड्डी के दोनों और होते हैं। रुधिर में से छनित नाइट्रोजनी वर्ज्य पदार्थ जैसे यूरिक अम्ल वृक्क में रुधिर से अलग कर लिए जाते हैं। इसके लिए पतली परत के रुप में कोशिकाओं का गुच्छा होता है जो अपशिष्ट पदार्थों को छान लेती हैं। छनित द्रव अपशिष्ट पदार्थ वृक्क से मूत्रवाहिनी में आते हैं। जो मूत्राशय में खुलती है। यहां एकत्र होकर मूत्र मार्ग द्वारा शरीर से बाहर त्याग दिए जाते हैं।
कृत्रिम वृक्क अपोहन -उत्तरजीवित के लिए वृक्क एक महत्वपूर्ण अंग है। यह संक्रमण, आघात या वृक्क में सीमित रुधिर प्रवाह के कारण अनियंत्रित हो सकता है जिससे इसकी कार्य क्षमता में कमी आ जाती है, और शरीर में विषैले अपशिष्ट को संचित करने लग जाता है। जो मृत्यु का कारण भी बन सकती है। इस स्थिति में कृत्रिम वृक्क का उपयोग कर सकते हैं। एक कृत्रिम वृक्क नाइट्रोजनी अपशिष्टों को रुधिर से अपोहन द्वारा निकलने का कार्य करता है। इस प्रकार मृत्यु से बचा जा सकता है।
वृकाणु (नेफ्रॉन)- नेफ्रॉन उत्सर्जन तंत्र की संरचनात्मक व क्रियात्मक इकाई होती है। मनुष्य के प्रत्येक वृक्क में लगभग दस लाख अतिसूक्ष्म नलिकाएं होती हैं जिन्हें नेफ्रॉन कहा जाता है। प्रत्येक नेफ्रॉन का प्रारम्भिक भाग प्याले के समान होता है। जिसे बोमेन सम्पुट कहते हैं। इस बोमेन सम्पुट के प्यालेनुमा भाग में रक्त नलिकाओं का जाल पाया जाता है। जिसे ग्लोमेरूलस कहते हैं।बोमेन सम्पुट व ग्लोमेरूलस दोनों मिलकर मैलपीगी कोश बनाते हैं। नेफ्रॉन का शेष भाग एक लंबी नलिका के रूप में होता है। वृक्क नलिकाएं आपस में संयोग करके संग्रह वाहिनियों में खुलती हैं। वृक्क की सभी संग्रह वाहिनियां अपनी ओर की मूत्रवाहिनियों में खुलती हैं। प्रत्येक मूत्र वाहिनी का अग्र भाग कीप की तरह चौड़ा होता हैं। जिसे पेल्विस कहते हैं। जबकि मूत्रवाहिनी का पिछला भाग लम्बी नलिका के रूप में होता है जो मूत्राशय में खुलता है।

पाठ 1 रासायनिक अभिक्रियाएं एवं समीकरण पढने के लिए यहाँ क्लिक करें. 

बुधवार, 8 अप्रैल 2020

लॉकडाउन को ध्यान में रखते हुए विद्या मंदिर इंटर कॉलेज नई टिहरी, ऑनलाइन मोड़ में कराएगा विद्यार्थियों को तैयारी.

रेखा डोभाल, विज्ञान शिक्षिका, सरस्वती  विद्या मंदिरइंटर कॉलेज नई टिहरी नगर उताराखंड
     प्रिय पाठकों, पूरी दुनिया इस समय कोरोना वायरस नामक अदृश्य दुश्मन से जूझ रही है और हम इस महासंकट से निपटने के लिए घरों में लॉकडाउन के दौर से गुजर रहे हैं. लॉकडाउन  से सबकुछ ठहर गया है और इसका बच्‍चों की पढ़ाई पर भी खासा असर पड़ रहा है. बच्चों की पढाई के साथ ही शैक्षिक सत्र के  भी काफी पिछड़ जाने की आशंका बन रही है. आशा है की आप घरों में रहते हुए पढ़ाई कर समय का सदपयोग कर रहे होंगे. लॉकडाउन के कारण सभी स्कूल-कॉलेज बंद हैं. इस दौरान  आप ऑनलाइन और वर्चुअल क्‍लासेज के माध्यम से पढ़ाई करते हुए अपनी विषयगत दक्षताओं को बढ़ा सकते हैं. इस पेज के माध्यम से कक्षा दस के विद्यार्थियों के लिए रसायन विज्ञान से सम्बन्धित नोट्स प्रस्तुत कर रही हूँ. आशा करती हूँ की मेरा यह प्रयास अभिभावकों और विद्यार्थियों के लिए उपयोगी सावित होगा. 

पाठ 1 रासायनिक अभिक्रियाएं एवं समीकरण
रासायनिक अभिक्रियाएं-
रासायनिक अभिक्रियाएं वे प्रक्रियाएं है जिनमें नये गुणधर्मों के साथ नये पदार्थों का निर्माण होता है। किसी अभिक्रिया को इस प्रकार व्यक्त किया जाता है कि बायें ओर अभिकारक तथा दायें ओर उत्पाद व मध्य में तीर का निशान लगा दिया जाता है। अभिकारकों व उत्पादों में योग (+) का चिह्न लगाया जाता है। वे पदार्थ जो अभिक्रिया में भाग लेते हैं, अभिकारक कहलाते हैं वे पदार्थ जो अभिक्रिया में नये बनते हैं, उत्पाद कहलाते हैं। जैसे: मैग्नीशियम + ऑक्सीजन → मैग्नीशियम ऑक्साइड 
यह समीकरण शब्द समीकरण है किसी भी अभिक्रिया को शब्द समीकरण के रूप में लिखना लम्बा हो जाता है। इसलिए रासायनिक अभिक्रिया को शब्दों के रूप में व्यक्त न करके रासायनिक सूत्र के रूप में व्यक्त किया जाता है। जिसे रासायनिक समीकरण कहते हैं।
2-संतुलित रासायनिक समीकरण-
संतुलित रासायनिक समीकरण में तीर के निशान के दोनों ओर प्रत्येक  तत्व के परमाणुओं की संख्या समान होती है। कंकाली समीकरण को संतुलित करना आवश्यक होता है। क्योंकि द्रव्यमान ऊर्जा संरक्षण के नियमानुसार किसी भी रासायनिक अभिक्रिया में द्रव्यमान का न तो निर्माण होता है ना ही विनाश होता है।अभिक्रिया में दोनों ओर परमाणुओं की संख्या समान होने पर उनका द्रव्यमान भी समान होता है। इसलिए रासायनिक समीकरण को संतुलित करना भी आवश्यक होता है।  समीकरण को संतुलित करने के लिए सर्वप्रथम जिस परमाणु की संख्या सर्वाधिक होती है उसे बराबर करते हैं इसके पश्चात् अन्य की संख्या को बराबर करते हैं।
3- रासायनिक अभिक्रियाओं के प्रकार- रासायनिक अभिक्रियाएँ मुख्य रूप से सात प्रकार की होती हैं जो निम्न हैं.
1. संयोजन अभिक्रिया
2. वियोजन या अपघटन अभिक्रिया
3. विस्थापन अभिक्रिया
4. द्विविस्थापन अभिक्रिया
5. उपचयन एवं अपचयन
6. उष्माक्षेपी अभिक्रिया 
7. उष्माशोषी अभिक्रिया
1-संयोजन अभिक्रिया- वे रासायनिक अभिक्रियाएँ जिनमें दो या दो से अधिक अभिकारक (पदार्थ) जुड़कर एकल उत्पाद का निर्माण करते हैं। संयोजन अभिक्रियाएँ कहलाती हैं। इस अभिक्रिया में ठोस कैल्शियम ऑक्साइड व जल का अणु जुड़कर एकल उत्पाद कैल्शियम हाइड्रोक्साइड का निर्माण कर रहे है। कैल्शियम ऑक्साइड बिना बुझा हुआ चूना होता है। जिसका उपयोग दीवारों की सफेदी करने में किया जाता है।उपरोक्त रासायनिक अभिक्रिया में निर्मित कैल्शियम हाइड्रोऑक्साइड को दीवारों पर सफेदी करने के दो या तीन दिन बाद तक यह CO2 से धीमी गति से क्रिया कर कैल्शियम कार्बोनेट का निर्माण करता है जिसे संगमरमर भी कहते हैं।
2-वियोजन या अपघटन अभिक्रिया- वे रासायनिक अभिक्रियाएँ जिनमें एकल अभिकारक (यौगिक) टूटकर दो या दो से अधिक उत्पाद बनाता है, वियोजन या अपघटन अभिक्रियाएँ कहलाती हैं। वियोजन अभिक्रिया में उष्मा का अवशोषण होता है इसलिए इन्हें उष्माशोषी अभिक्रिया भी कहा जाता है। इसके तीन रूप होते हैं 
1. उष्मा 
2. तापन
3. विद्युत्धारा
3. विस्थापन अभिक्रिया
वे रासायनिक अभिक्रियाएँ जिनमें एक तत्व दूसरे तत्व को उसके यौगिक से अलग कर देता है, विस्थापन अभिक्रियाएँ कहलाती हैं। जैसे: - लोहे की कील को कॉपर सल्फेट के विलयन में ले जाने पर कील का रंग भूरा हो जाता हे तथा कॉपर सल्फेट के विलयन का रंग नीला मलीन हो जाता है। क्योंकी लोहा(आयरन), कॉपर को उसके विलयन से पृथक कर देता है।
4. द्विविस्थापन अभिक्रिया- वे रासायनिक अभिक्रियाएँ जिनमें क्रिया कारकों के बीच आयनों का आदान-प्रदान होता है व सभी अभिक्रियाएँ द्विविस्थापन अभिक्रियाएँ कहलाती हैं। इस अभिक्रिया में Ba2+ तथा (SO4) 2-  आयनों की क्रिया से BaSO4 के अवक्षेप का निर्माण होता है।
5. उपचयन एवं अपचयन- वे रासायनिक अभिक्रियाएँ जिनमें एक अभिकारक का उपचयन व दूसरे अभिकारक का अपचयन होता है वे अभिक्रियाएँ उपचयन - अपचयन (रेडॉक्स) अभिक्रियाएँ कहलाती हैं।
अभिकारक में ऑक्सीजन का जुड़ना अथवा हाइड्रोजन का निकलना उपचयन तथा ऑक्सीजन का निकलना अथवा हाइड्रोजन का जुड़ना अपचयन कहलाता है।जैसे:- इस रासायनिक अभिक्रिया का तापन कराने पर कॉपर का अपचयन व हाइड्रोजन का उपचयन हो जाता है।
6. उष्माक्षेपी अभिक्रिया- वे रासायनिक अभिक्रियाएँ जिनमें उत्पाद के निर्माण के साथ-साथ उष्मा का भी उत्सर्जन होता है वे सभी अभिक्रियाएँ उष्माक्षेपी अभिक्रियाएँ कहलाती हैं। जैसे प्राकृतिक गैस का दहन
7. उष्माशोषी अभिक्रिया- वे रासायनिक अभिक्रियाएँ जिनमें उष्मा का अवशोषण होता है वे सभी अभिक्रियाएँ उष्माशोषी अभिक्रियाएँ कहलाती हैं। सभी अपघटन अभिक्रियाएं ऊष्माक्षेपी होती है।
1. संक्षारण- जब कोई धातु अम्ल, क्षार, नमी आदि के संपर्क में आती हे तो वह नष्ट होने लगती हे जिसे संक्षारण कहते हैं। संक्षारण के कारण चाँदी के ऊपर काली परत व ताँबे के ऊपर हरे रंग की परत चढ़ जाती है। संक्षारण के कारण ही पुल, लोहे की रेलिंग, जहाज, धातु, विशेषकर लोहे से बनी वस्तुएं नष्ट हो जाती हैं। जिसका मुख्य कारण उपचयन अभिक्रिया है। संक्षारण को पैंट करके रोका जा सकता है।
2. विकृतगंधिता- वसायुक्त अथवा तैलिय खाद्य सामग्री जब लंबे समय तक रखे रह जाते हैं तो इनका उपचयन हो जाता है जिसके कारण इनका स्वाद एवं गंध बदल जाती हैं तथा ये विकृतगंधी हो जाती हैं, इसके प्रभाव को रोकने के लिए खाद्य सामग्री को वायुरोधी बर्तनों में रखा जाता है। चिप्स बनाने वाले चिप्स की थैली में से ऑक्सीजन निकालकर नाइट्रोजन जैसी कम सक्रिय गैस भर देते हैं ताकि उनका उपचयन ना हो सकें.
क्रमशः

बुधवार, 19 फ़रवरी 2020

9वीं में अध्ययनरत स्कूली बच्चों को इसरो का बुलावा, यंग साइंटिस्ट बनने के लिए करना होगा ऑनलाइन आवेदन.

रेखा डोभाल
प्रिय विद्यार्थियों इस पोस्ट के माध्यम से आपको भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के महत्वकांक्षी कार्यक्रम ''युविका 2020'' के बारे में बताने जा रही हूँ. यदि आप विज्ञान और विशेषरूप से अन्तरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में रुचि रखते हैं तो यह कार्यक्रम आपके सपनो को साकार कर  सकता है. इसरो ने कक्षा 9 में अध्ययनरत ऐसे बच्चों से यंग साइंटिस्ट प्रोग्राम के लिए आवेदन मांगे हैं जो विज्ञान में रुचि रखने के साथ विभिन्न प्रतियोगिताओं में जिले, राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर बेहतर प्रदर्शन कर चुके हैं.
     जी हाँ, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने स्कूली छात्रों को अंतरिक्ष की जानकारी और उसकी टेकनोलॉजी समझने के लिए यंग साइंटिस्ट प्रोग्राम का दूसरा संस्करण शुरू कर दिया है।  इसरो के युवा विज्ञानी कार्यक्रम (युविका) 2020 के लिए 24 फरवरी, 2020 तक www.isro.gov.in पर आवेदन किए जा सकते हैं। यह कार्यक्रम गर्मियों के छुट्टियों के दौरान दो सप्ताह 11 मई से 22 मई 2020 तक चलेगा। आपको बताना चाहूँगा की  इसरो का ''युविका कार्यक्रम'' 2019 में शुरू किया गया था। इस कार्यक्रम का मकसद बच्चों को स्पेस टक्नोलॉजी, स्पेस साइंस जैसी चीजों के बारे में जागरूक करना है।
योग्यता
जिन स्टूडेंट्स ने आठवीं की परीक्षा पास कर ली है और नौवीं में पढ़ाई कर रहे हैं, वह इस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए आवेदन कर सकते हैं। इस कार्यक्रम में भाग लेने के लिए सीबीएसई, आईसीएसई और राज्‍य पाठ्यक्रम को मिलाकर हर राज्‍य/केंद्र शासित प्रदेश से तीन विद्यार्थियों का चयन किया जाएगा। देश भर से प्रवासी भारतीय नागरिक (ओसीआई) अभ्यर्थियों के लिए पांच अन्य सीटें आरक्षित हैं।
चयन
उम्मीदवारों का चयन ऑनलाइन पंजीकरण के जरिए किया जाएगा। इसके लिए 24 फरवरी तक ऑनलाइन पंजीकरण प्रक्रिया चलेगी। 8वीं के प्राप्त मार्क्स और एक्स्ट्रा करिकुलर एक्टिविटीज में प्रदर्शन के आधार स्टूडेंट्स का चयन होगा।

कब से होंगे आवेदन, कब प्रशिक्षण

  • आधिकारिक अधिसूचना के अनुसार, इसरो युवा विज्ञानी कार्यक्रम 2020 के लिए आवेदन की प्रक्रिया 3 फरवरी 2020 से शुरू हो रही है। विद्यार्थियों के पास 24 फरवरी 2020 तक आवेदन करने का अवसर है।
  • चयनित छात्र-छात्राओं की प्रोविजनल मेरिट सूची 2 मार्च 2020 तक जारी कर दी जाएगी। इसके बाद उन्हें बताए गए दस्तावेजों की प्रतियां 23 मार्च 2020 तक या अपलोड करनी होंगी।
  • चयनित छात्र-छात्राओं की अंतिम सूची मार्च के अंत तक जारी कर दी जाएगी।
  • युवा विज्ञानी कार्यक्रम 2020 का आयोजन 11 मई से 22 मई 2020 तक किया जाएगा।
अधिक जानकारी के लिए नीचे कमेन्ट बॉक्स में लिखें और इसरो की आधिकारिक वेबसाइट पर जाने के लिए यहां क्लिक करें।

बुधवार, 6 नवंबर 2019

सांप की मणि, मुंसी प्रेमचन्द की कहानी।

साँप का मणि।

मैं जब जहाज़ पर नौकर था तो एक बार कोलंबो भी गया था। बहुत दिनों से वहाँ जाने को मन चाहता था, खासकर रावण की लंकापुरी देखने के लिए । कलकत्ते से सात दिन में जहाज कोलम्बो पहुँचा । मेरा एक दोस्त वहां किसी कारखाने में नौकर था, मैंने पहले ही उसे खत डाल दिया था । वह घाट पर आ पहुँचा था। दम दोनों गले मिले और कोलम्बो की सैर करने चले। जहाज़ वहां चार दिन रुकनेवाला था। मैंने कप्तान साहब से चार दिन की छुट्टी ले ली जब हम दोनों खा-पी चुके, तो गप शप होने लगी। वहाँ के सीप और मोती की बात छिड़ गई। मेरे दोस्त ने कहा-यह सब चीज़ें तो यहाँ समुद्र में निकलती ही हैं और आसानी से मिल जायेंगी, मगर मैं तुम्हें एक ऐसी चीज़ दूंगा जो शायद तुमने कभी न देखी हो । हाँ, उसका हाल किताबों में पढ़ा होगा।

मैंने ताअजुब्ब से पूछा-वह कौन-सी चीज है ?
'साँप का मणि।"
मैं चौंक उठा और बोला-साँप का मणि ! उसका जिक्र तो मैंने किस्से-कहानियों में सुना है कौर यह भी सुना है कि उसका मोल सात बादशाहों के बराबर होता है । क्या साँप का असली मणि ?
वह बोले-हां भाई, असली मणि । तुम्हें मिल जाय तब तो मानोगे।
मुझे विश्वास न हुआ । वह फिर बोले-यहाँ पचासों किस्म के सांप हैं, मगर मणि एक ही तरह के साँपों के पास होता है। उसे कालिया कहते हैं। यह बात सच है कि यह चीज़ मुश्किल से मिलती है। पचासों में शायद एक के पास निकले । मगर मिलती जरूर है।
मैंने सुना था कि साँप मणि को अपने सिर पर रखता है, मगर यह बात ग़लत निकली। मेरे दोस्त ने कहा-यह चीज़ उसके मुँह में होती है ।
मैंने पूछा-तो मुँह के अन्दर से चमक कैसे नज़र आती है !

दोस्‍त ने हँसकर कहा-जब उसे रोशनी की ज़रूरत होती है, तो वह किसी साफ़ पत्थर पर उसे सामने रख देता है। उस वक्त ज़रा भी खटका हो तो वह झट उसे मुँह में दबाकर भाग जाता है। उसकी यह आदत है कि जहाँ एक बार मणि को निकालता है, वहीं बार-बार आता है। मैं आज ही अपने आदमियों से कहे देता हूँ और वे लोग कहीं न-कहीं से ज़रूर खबर लायेंगे।

दो दिन गुजर गये, तीसरे दिन शाम को मेरे दोस्‍त ने मुझसे कहा-लो भाई, मणि का पता चल गया।

मैं झट उठ खड़ा हुआ और अपने दोस्‍त के साथ बाहर आया तो वह आदमी खड़ा था, जो मणि की ख़बर लाया था। वह कहने लगा--अभी मैं एक साँप को मणि से खेलते देख आया हूँ। अगर आप इसी वक्त चलें, तो मणि हाथ आ सकता है। हम फौरन उसके साथ चल दिये । थोड़ी देर में हम एक जंगल में पहुँचे। उस आदमी ने एक तरफ़ उंगली से इशारा करके कहा-वह देखिए, साँप मणि रखे बैठा है। मैंने उस तरफ़ देखा तो सचमुच कोई २० गज की दूरी पर एक साँप फन उठाये बैठा है और उसके आसपास उजाला हो रहा है। पहले तो मैंने समझा कि शायद जुगुनू हो पर वह रोशनी ठहरी हुई है । जुगुनू की चमक चंचल होती है-कभी दिखाई देती है, कभी ग़ायब हो जाती है। मैं बड़ी देर तक सोचता रहा कि किस उपाय से मणि हाथ लगे। आखिर मैंने उस आदमी से कहा-मुझसे बड़ी ग़लती हुई कि बन्दूक नहीं लाया, नहीं तो इसे मारकर मणि को उठा लेता। उस आदमी ने कहा-बन्दूक की कोई ज़रूरत नहीं है साहब, आप थोड़ी देर रुकिए, मैं अभी आया। यह कहकर वह कहीं चला गया।

थोड़ी देर के बाद वह कुछ हाथ में लिये लौटा ।
मैंने पूछा-तुम्हारे हाथ में क्‍या है ?
उसने कहा-कीचड़ ।
मैंने पूछा-कीचड़, क्‍या होगा ?
उसने कहा-चुप चाप देखिए, मैं क्या करता हूँ।

वह चुपके से एक पेड़ पर चढ़ गया और मुझे भी चढ़ने का इशारा किया। मैं भी ऊपर चढ़ा। तब वह डालियों पर होता हुआ ठीक साँप के ऊपर आ गया, और एकाएक उस मणि पर कीचड़ फेंक दिया। अंधेरा छा गया। साँप घबड़ाकर इधर-उधर दौड़ने लगा। थोड़ी देर के बाद पत्तियों की खड़खड़ाहट बन्द हो गई। मैंने समझा सांप चला गया। पेड़ से उतरने लगा। उस आदमी ने मुझे पकड़ लिया और कहा-भूलकर भी नीचे न जाईएगा, नहीं तो घर तक न पहुँचिएगा । वह सांप यहीं पर कहीं न कहीं छिपा बैठा है।

इम दोनों ने उसी पेड़ पर रात काटी ।
दूसरे दिन सुबह होते ही हम दोनों इधर उघर देखकर नीचे उतरे। साथी ने कीचड़ हटा दिया। मणि नीचे पड़ा था। मैं मारे खुशी के मतवाला हो गया।
जब हम दोनों घर पहुँचे, तो मेरे दोस्त ने कहा-अब तो तुम्हें विश्वास आया या अब भी नहीं ?
मैंने कहा-हाँ, साँप के पास से इसे लाया हूँ जरूर, मगर मुझे अभी तक सन्देह है कि यह वही मणि है, जिसका मोल सात बादशाहों के बराबर है ।

दर्याफ्त करने पर मालूम हुआ कि वह एक किस्म का पत्थर है, जो गर्म होकर अंधेरे में जलने लगता है। जब तक वह ठंडा नहीं हो जाता, वह इसी तरह रोशन रहता है। सांप इसे दिनभर अपने मुँह में रखता है, ताकि यह गर्म रहे। रात को वह इसे किसी जंगल में निकालता है और इसकी रोशनी में कीड़े-मकोड़े पकड़कर खाता है।

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रविवार, 18 अगस्त 2019

मधुशाला

मधुशाला
मृदु भावों के अंगूरों की आज बना लाया हाला,
प्रियतम, अपने ही हाथों से आज पिलाऊँगा प्याला,
पहले भोग लगा लूँ तेरा फिर प्रसाद जग पाएगा,
सबसे पहले तेरा स्वागत करती मेरी मधुशाला।।१।

प्यास तुझे तो, विश्व तपाकर पूर्ण निकालूँगा हाला,
एक पाँव से साकी बनकर नाचूँगा लेकर प्याला,
जीवन की मधुता तो तेरे ऊपर कब का वार चुका,
आज निछावर कर दूँगा मैं तुझ पर जग की मधुशाला।।२।

प्रियतम, तू मेरी हाला है, मैं तेरा प्यासा प्याला,
अपने को मुझमें भरकर तू बनता है पीनेवाला,
मैं तुझको छक छलका करता, मस्त मुझे पी तू होता,
एक दूसरे की हम दोनों आज परस्पर मधुशाला।।३।

भावुकता अंगूर लता से खींच कल्पना की हाला,
कवि साकी बनकर आया है भरकर कविता का प्याला,
कभी न कण-भर खाली होगा लाख पिएँ, दो लाख पिएँ!
पाठकगण हैं पीनेवाले, पुस्तक मेरी मधुशाला।।४।

मधुर भावनाओं की सुमधुर नित्य बनाता हूँ हाला,
भरता हूँ इस मधु से अपने अंतर का प्यासा प्याला,
उठा कल्पना के हाथों से स्वयं उसे पी जाता हूँ,
अपने ही में हूँ मैं साकी, पीनेवाला, मधुशाला।।५।

मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवला,
'किस पथ से जाऊँ?' असमंजस में है वह भोलाभाला,
अलग-अलग पथ बतलाते सब पर मैं यह बतलाता हूँ -
'राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला।'। ६।

चलने ही चलने में कितना जीवन, हाय, बिता डाला!
'दूर अभी है', पर, कहता है हर पथ बतलानेवाला,
हिम्मत है न बढूँ आगे को साहस है न फिरुँ पीछे,
किंकर्तव्यविमूढ़ मुझे कर दूर खड़ी है मधुशाला।।७।

मुख से तू अविरत कहता जा मधु, मदिरा, मादक हाला,
हाथों में अनुभव करता जा एक ललित कल्पित प्याला,
ध्यान किए जा मन में सुमधुर सुखकर, सुंदर साकी का,
और बढ़ा चल, पथिक, न तुझको दूर लगेगी मधुशाला।।८।

मदिरा पीने की अभिलाषा ही बन जाए जब हाला,
अधरों की आतुरता में ही जब आभासित हो प्याला,
बने ध्यान ही करते-करते जब साकी साकार, सखे,
रहे न हाला, प्याला, साकी, तुझे मिलेगी मधुशाला।।९।

सुन, कलकल़ , छलछल़ मधुघट से गिरती प्यालों में हाला,
सुन, रूनझुन रूनझुन चल वितरण करती मधु साकीबाला,
बस आ पहुंचे, दुर नहीं कुछ, चार कदम अब चलना है,
चहक रहे, सुन, पीनेवाले, महक रही, ले, मधुशाला।।१०।

जलतरंग बजता, जब चुंबन करता प्याले को प्याला,
वीणा झंकृत होती, चलती जब रूनझुन साकीबाला,
डाँट डपट मधुविक्रेता की ध्वनित पखावज करती है,
मधुरव से मधु की मादकता और बढ़ाती मधुशाला।।११।

मेंहदी रंजित मृदुल हथेली पर माणिक मधु का प्याला,
अंगूरी अवगुंठन डाले स्वर्ण वर्ण साकीबाला,
पाग बैंजनी, जामा नीला डाट डटे पीनेवाले,
इन्द्रधनुष से होड़ लगाती आज रंगीली मधुशाला।।१२।

हाथों में आने से पहले नाज़ दिखाएगा प्याला,
अधरों पर आने से पहले अदा दिखाएगी हाला,
बहुतेरे इनकार करेगा साकी आने से पहले,
पथिक, न घबरा जाना, पहले मान करेगी मधुशाला।।१३।

लाल सुरा की धार लपट सी कह न इसे देना ज्वाला,
फेनिल मदिरा है, मत इसको कह देना उर का छाला,
दर्द नशा है इस मदिरा का विगत स्मृतियाँ साकी हैं,
पीड़ा में आनंद जिसे हो, आए मेरी मधुशाला।।१४।

जगती की शीतल हाला सी पथिक, नहीं मेरी हाला,
जगती के ठंडे प्याले सा पथिक, नहीं मेरा प्याला,
ज्वाल सुरा जलते प्याले में दग्ध हृदय की कविता है,
जलने से भयभीत न जो हो, आए मेरी मधुशाला।।१५।

बहती हाला देखी, देखो लपट उठाती अब हाला,
देखो प्याला अब छूते ही होंठ जला देनेवाला,
'होंठ नहीं, सब देह दहे, पर पीने को दो बूंद मिले'
ऐसे मधु के दीवानों को आज बुलाती मधुशाला।।१६।

धर्मग्रन्थ सब जला चुकी है, जिसके अंतर की ज्वाला,
मंदिर, मसजिद, गिरिजे, सब को तोड़ चुका जो मतवाला,
पंडित, मोमिन, पादिरयों के फंदों को जो काट चुका,
कर सकती है आज उसी का स्वागत मेरी मधुशाला।।१७।

लालायित अधरों से जिसने, हाय, नहीं चूमी हाला,
हर्ष-विकंपित कर से जिसने, हा, न छुआ मधु का प्याला,
हाथ पकड़ लज्जित साकी को पास नहीं जिसने खींचा,
व्यर्थ सुखा डाली जीवन की उसने मधुमय मधुशाला।।१८।

बने पुजारी प्रेमी साकी, गंगाजल पावन हाला,
रहे फेरता अविरत गति से मधु के प्यालों की माला'
'और लिये जा, और पीये जा', इसी मंत्र का जाप करे'
मैं शिव की प्रतिमा बन बैठूं, मंदिर हो यह मधुशाला।।१९।

बजी न मंदिर में घड़ियाली, चढ़ी न प्रतिमा पर माला,
बैठा अपने भवन मुअज्ज़िन देकर मस्जिद में ताला,
लुटे ख़जाने नरपितयों के गिरीं गढ़ों की दीवारें,
रहें मुबारक पीनेवाले, खुली रहे यह मधुशाला।।२०।

बड़े बड़े परिवार मिटें यों, एक न हो रोनेवाला,
हो जाएँ सुनसान महल वे, जहाँ थिरकतीं सुरबाला,
राज्य उलट जाएँ, भूपों की भाग्य सुलक्ष्मी सो जाए,
जमे रहेंगे पीनेवाले, जगा करेगी मधुशाला।।२१।

सब मिट जाएँ, बना रहेगा सुन्दर साकी, यम काला,
सूखें सब रस, बने रहेंगे, किन्तु, हलाहल औ' हाला,
धूमधाम औ' चहल पहल के स्थान सभी सुनसान बनें,
जगा करेगा अविरत मरघट, जगा करेगी मधुशाला।।२२।

भुरा सदा कहलायेगा जग में बाँका, मदचंचल प्याला,
छैल छबीला, रसिया साकी, अलबेला पीनेवाला,
पटे कहाँ से, मधु औ' जग की जोड़ी ठीक नहीं,
जग जर्जर प्रतिदन, प्रतिक्षण, पर नित्य नवेली मधुशाला।।२३।

बिना पिये जो मधुशाला को बुरा कहे, वह मतवाला,
पी लेने पर तो उसके मुह पर पड़ जाएगा ताला,
दास द्रोहियों दोनों में है जीत सुरा की, प्याले की,
विश्वविजयिनी बनकर जग में आई मेरी मधुशाला।।२४।

हरा भरा रहता मदिरालय, जग पर पड़ जाए पाला,
वहाँ मुहर्रम का तम छाए, यहाँ होलिका की ज्वाला,
स्वर्ग लोक से सीधी उतरी वसुधा पर, दुख क्या जाने,
पढ़े मर्सिया दुनिया सारी, ईद मनाती मधुशाला।।२५।

एक बरस में, एक बार ही जगती होली की ज्वाला,
एक बार ही लगती बाज़ी, जलती दीपों की माला,
दुनियावालों, किन्तु, किसी दिन आ मदिरालय में देखो,
दिन को होली, रात दिवाली, रोज़ मनाती मधुशाला।।२६।

नहीं जानता कौन, मनुज आया बनकर पीनेवाला,
कौन अपिरिचत उस साकी से, जिसने दूध पिला पाला,
जीवन पाकर मानव पीकर मस्त रहे, इस कारण ही,
जग में आकर सबसे पहले पाई उसने मधुशाला।।२७।

बनी रहें अंगूर लताएँ जिनसे मिलती है हाला,
बनी रहे वह मिटटी जिससे बनता है मधु का प्याला,
बनी रहे वह मदिर पिपासा तृप्त न जो होना जाने,
बनें रहें ये पीने वाले, बनी रहे यह मधुशाला।।२८।

सकुशल समझो मुझको, सकुशल रहती यदि साकीबाला,
मंगल और अमंगल समझे मस्ती में क्या मतवाला,
मित्रों, मेरी क्षेम न पूछो आकर, पर मधुशाला की,
कहा करो 'जय राम' न मिलकर, कहा करो 'जय मधुशाला'।।२९।

सूर्य बने मधु का विक्रेता, सिंधु बने घट, जल, हाला,
बादल बन-बन आए साकी, भूमि बने मधु का प्याला,
झड़ी लगाकर बरसे मदिरा रिमझिम, रिमझिम, रिमझिम कर,
बेलि, विटप, तृण बन मैं पीऊँ, वर्षा ऋतु हो मधुशाला।।३०।

तारक मणियों से सज्जित नभ बन जाए मधु का प्याला,
सीधा करके भर दी जाए उसमें सागरजल हाला,
मत्त समीरण साकी बनकर अधरों पर छलका जाए,
फैले हों जो सागर तट से विश्व बने यह मधुशाला।।३१।

अधरों पर हो कोई भी रस जिहवा पर लगती हाला,
भाजन हो कोई हाथों में लगता रक्खा है प्याला,
हर सूरत साकी की सूरत में परिवर्तित हो जाती,
आँखों के आगे हो कुछ भी, आँखों में है मधुशाला।।३२।

पौधे आज बने हैं साकी ले ले फूलों का प्याला,
भरी हुई है जिसके अंदर पिरमल-मधु-सुरिभत हाला,
माँग माँगकर भ्रमरों के दल रस की मदिरा पीते हैं,
झूम झपक मद-झंपित होते, उपवन क्या है मधुशाला!।३३।

प्रति रसाल तरू साकी सा है, प्रति मंजरिका है प्याला,
छलक रही है जिसके बाहर मादक सौरभ की हाला,
छक जिसको मतवाली कोयल कूक रही डाली डाली
हर मधुऋतु में अमराई में जग उठती है मधुशाला।।३४।

मंद झकोरों के प्यालों में मधुऋतु सौरभ की हाला
भर भरकर है अनिल पिलाता बनकर मधु-मद-मतवाला,
हरे हरे नव पल्लव, तरूगण, नूतन डालें, वल्लरियाँ,
छक छक, झुक झुक झूम रही हैं, मधुबन में है मधुशाला।।३५।

साकी बन आती है प्रातः जब अरुणा ऊषा बाला,
तारक-मणि-मंडित चादर दे मोल धरा लेती हाला,
अगणित कर-किरणों से जिसको पी, खग पागल हो गाते,
प्रति प्रभात में पूर्ण प्रकृति में मुखिरत होती मधुशाला।।३६।

उतर नशा जब उसका जाता, आती है संध्या बाला,
बड़ी पुरानी, बड़ी नशीली नित्य ढला जाती हाला,
जीवन के संताप शोक सब इसको पीकर मिट जाते
सुरा-सुप्त होते मद-लोभी जागृत रहती मधुशाला।।३७।

अंधकार है मधुविक्रेता, सुन्दर साकी शशिबाला
किरण किरण में जो छलकाती जाम जुम्हाई का हाला,
पीकर जिसको चेतनता खो लेने लगते हैं झपकी
तारकदल से पीनेवाले, रात नहीं है, मधुशाला।।३८।

किसी ओर मैं आँखें फेरूँ, दिखलाई देती हाला
किसी ओर मैं आँखें फेरूँ, दिखलाई देता प्याला,
किसी ओर मैं देखूं, मुझको दिखलाई देता साकी
किसी ओर देखूं, दिखलाई पड़ती मुझको मधुशाला।।३९।

साकी बन मुरली आई साथ लिए कर में प्याला,
जिनमें वह छलकाती लाई अधर-सुधा-रस की हाला,
योगिराज कर संगत उसकी नटवर नागर कहलाए,
देखो कैसों-कैसों को है नाच नचाती मधुशाला।।४०।

वादक बन मधु का विक्रेता लाया सुर-सुमधुर-हाला,
रागिनियाँ बन साकी आई भरकर तारों का प्याला,
विक्रेता के संकेतों पर दौड़ लयों, आलापों में,
पान कराती श्रोतागण को, झंकृत वीणा मधुशाला।।४१।

चित्रकार बन साकी आता लेकर तूली का प्याला,
जिसमें भरकर पान कराता वह बहु रस-रंगी हाला,
मन के चित्र जिसे पी-पीकर रंग-बिरंगे हो जाते,
चित्रपटी पर नाच रही है एक मनोहर मधुशाला।।४२।

घन श्यामल अंगूर लता से खिंच खिंच यह आती हाला,
अरूण-कमल-कोमल कलियों की प्याली, फूलों का प्याला,
लोल हिलोरें साकी बन बन माणिक मधु से भर जातीं,
हंस मत्त होते पी पीकर मानसरोवर मधुशाला।।४३।

हिम श्रेणी अंगूर लता-सी फैली, हिम जल है हाला,
चंचल नदियाँ साकी बनकर, भरकर लहरों का प्याला,
कोमल कूर-करों में अपने छलकाती निशिदिन चलतीं,
पीकर खेत खड़े लहराते, भारत पावन मधुशाला।।४४।

धीर सुतों के हृदय रक्त की आज बना रक्तिम हाला,
वीर सुतों के वर शीशों का हाथों में लेकर प्याला,
अति उदार दानी साकी है आज बनी भारतमाता,
स्वतंत्रता है तृषित कालिका बलिवेदी है मधुशाला।।४५।

दुतकारा मस्जिद ने मुझको कहकर है पीनेवाला,
ठुकराया ठाकुरद्वारे ने देख हथेली पर प्याला,
कहाँ ठिकाना मिलता जग में भला अभागे काफिर को?
शरणस्थल बनकर न मुझे यदि अपना लेती मधुशाला।।४६।

पथिक बना मैं घूम रहा हूँ, सभी जगह मिलती हाला,
सभी जगह मिल जाता साकी, सभी जगह मिलता प्याला,
मुझे ठहरने का, हे मित्रों, कष्ट नहीं कुछ भी होता,
मिले न मंदिर, मिले न मस्जिद, मिल जाती है मधुशाला।।४७।

सजें न मस्जिद और नमाज़ी कहता है अल्लाताला,
सजधजकर, पर, साकी आता, बन ठनकर, पीनेवाला,
शेख, कहाँ तुलना हो सकती मस्जिद की मदिरालय से
चिर विधवा है मस्जिद तेरी, सदा सुहागिन मधुशाला।।४८।

बजी नफ़ीरी और नमाज़ी भूल गया अल्लाताला,
गाज गिरी, पर ध्यान सुरा में मग्न रहा पीनेवाला,
शेख, बुरा मत मानो इसको, साफ़ कहूँ तो मस्जिद को
अभी युगों तक सिखलाएगी ध्यान लगाना मधुशाला!।४९।

मुसलमान औ' हिन्दू है दो, एक, मगर, उनका प्याला,
एक, मगर, उनका मदिरालय, एक, मगर, उनकी हाला,
दोनों रहते एक न जब तक मस्जिद मन्दिर में जाते,
बैर बढ़ाते मस्जिद मन्दिर मेल कराती मधुशाला!।५०।

कोई भी हो शेख नमाज़ी या पंडित जपता माला,
बैर भाव चाहे जितना हो मदिरा से रखनेवाला,
एक बार बस मधुशाला के आगे से होकर निकले,
देखूँ कैसे थाम न लेती दामन उसका मधुशाला!।५१।

और रसों में स्वाद तभी तक, दूर जभी तक है हाला,
इतरा लें सब पात्र न जब तक, आगे आता है प्याला,
कर लें पूजा शेख, पुजारी तब तक मस्जिद मन्दिर में
घूँघट का पट खोल न जब तक झाँक रही है मधुशाला।।५२।

आज करे परहेज़ जगत, पर, कल पीनी होगी हाला,
आज करे इन्कार जगत पर कल पीना होगा प्याला,
होने दो पैदा मद का महमूद जगत में कोई, फिर
जहाँ अभी हैं मन्दिर मस्जिद वहाँ बनेगी मधुशाला।।५३।

यज्ञ अग्नि सी धधक रही है मधु की भटठी की ज्वाला,
ऋषि सा ध्यान लगा बैठा है हर मदिरा पीने वाला,
मुनि कन्याओं सी मधुघट ले फिरतीं साकीबालाएँ,
किसी तपोवन से क्या कम है मेरी पावन मधुशाला।।५४।

सोम सुरा पुरखे पीते थे, हम कहते उसको हाला,
द्रोणकलश जिसको कहते थे, आज वही मधुघट आला,
वेदिवहित यह रस्म न छोड़ो वेदों के ठेकेदारों,
युग युग से है पुजती आई नई नहीं है मधुशाला।।५५।

वही वारूणी जो थी सागर मथकर निकली अब हाला,
रंभा की संतान जगत में कहलाती 'साकीबाला',
देव अदेव जिसे ले आए, संत महंत मिटा देंगे!
किसमें कितना दम खम, इसको खूब समझती मधुशाला।।५६।

कभी न सुन पड़ता, 'इसने, हा, छू दी मेरी हाला',
कभी न कोई कहता, 'उसने जूठा कर डाला प्याला',
सभी जाति के लोग यहाँ पर साथ बैठकर पीते हैं,
सौ सुधारकों का करती है काम अकेले मधुशाला।।५७।

श्रम, संकट, संताप, सभी तुम भूला करते पी हाला,
सबक बड़ा तुम सीख चुके यदि सीखा रहना मतवाला,
व्यर्थ बने जाते हो हिरजन, तुम तो मधुजन ही अच्छे,
ठुकराते हैं मंदिरवाले, पलक बिछाती मधुशाला।।५८।

एक तरह से सबका स्वागत करती है साकीबाला,
अज्ञ विज्ञ में है क्या अंतर हो जाने पर मतवाला,
रंक राव में भेद हुआ है कभी नहीं मदिरालय में,
साम्यवाद की प्रथम प्रचारक है यह मेरी मधुशाला।।५९।

बार बार मैंने आगे बढ़ आज नहीं माँगी हाला,
समझ न लेना इससे मुझको साधारण पीने वाला,
हो तो लेने दो ऐ साकी दूर प्रथम संकोचों को,
मेरे ही स्वर से फिर सारी गूँज उठेगी मधुशाला।।६०।

कल? कल पर विश्वास किया कब करता है पीनेवाला
हो सकते कल कर जड़ जिनसे फिर फिर आज उठा प्याला,
आज हाथ में था, वह खोया, कल का कौन भरोसा है,
कल की हो न मुझे मधुशाला काल कुटिल की मधुशाला।।६१।

आज मिला अवसर, तब फिर क्यों मैं न छकूँ जी-भर हाला
आज मिला मौका, तब फिर क्यों ढाल न लूँ जी-भर प्याला,
छेड़छाड़ अपने साकी से आज न क्यों जी-भर कर लूँ,
एक बार ही तो मिलनी है जीवन की यह मधुशाला।।६२।

आज सजीव बना लो, प्रेयसी, अपने अधरों का प्याला,
भर लो, भर लो, भर लो इसमें, यौवन मधुरस की हाला,
और लगा मेरे होठों से भूल हटाना तुम जाओ,
अथक बनू मैं पीनेवाला, खुले प्रणय की मधुशाला।।६३।

सुमुखी तुम्हारा, सुन्दर मुख ही, मुझको कन्चन का प्याला
छलक रही है जिसमें माणिक रूप मधुर मादक हाला,
मैं ही साकी बनता, मैं ही पीने वाला बनता हूँ
जहाँ कहीं मिल बैठे हम तुम़ वहीं गयी हो मधुशाला।।६४।

दो दिन ही मधु मुझे पिलाकर ऊब उठी साकीबाला,
भरकर अब खिसका देती है वह मेरे आगे प्याला,
नाज़, अदा, अंदाजों से अब, हाय पिलाना दूर हुआ,
अब तो कर देती है केवल फ़र्ज़ - अदाई मधुशाला।।६५।

छोटे-से जीवन में कितना प्यार करुँ, पी लूँ हाला,
आने के ही साथ जगत में कहलाया 'जानेवाला',
स्वागत के ही साथ विदा की होती देखी तैयारी,
बंद लगी होने खुलते ही मेरी जीवन-मधुशाला।।६६।

क्या पीना, निर्द्वन्द न जब तक ढाला प्यालों पर प्याला,
क्या जीना, निश्चिंत न जब तक साथ रहे साकीबाला,
खोने का भय, हाय, लगा है पाने के सुख के पीछे,
मिलने का आनंद न देती मिलकर के भी मधुशाला।।६७।

मुझे पिलाने को लाए हो इतनी थोड़ी-सी हाला!
मुझे दिखाने को लाए हो एक यही छिछला प्याला!
इतनी पी जीने से अच्छा सागर की ले प्यास मरुँ,
सिंधु-तृषा दी किसने रचकर बिंदु-बराबर मधुशाला।।६८।

क्या कहता है, रह न गई अब तेरे भाजन में हाला,
क्या कहता है, अब न चलेगी मादक प्यालों की माला,
थोड़ी पीकर प्यास बढ़ी तो शेष नहीं कुछ पीने को,
प्यास बुझाने को बुलवाकर प्यास बढ़ाती मधुशाला।।६९।

लिखी भाग्य में जितनी बस उतनी ही पाएगा हाला,
लिखा भाग्य में जैसा बस वैसा ही पाएगा प्याला,
लाख पटक तू हाथ पाँव, पर इससे कब कुछ होने का,
लिखी भाग्य में जो तेरे बस वही मिलेगी मधुशाला।।७०।

कर ले, कर ले कंजूसी तू मुझको देने में हाला,
दे ले, दे ले तू मुझको बस यह टूटा फूटा प्याला,
मैं तो सब्र इसी पर करता, तू पीछे पछताएगी,
जब न रहूँगा मैं, तब मेरी याद करेगी मधुशाला।।७१।

ध्यान मान का, अपमानों का छोड़ दिया जब पी हाला,
गौरव भूला, आया कर में जब से मिट्टी का प्याला,
साकी की अंदाज़ भरी झिड़की में क्या अपमान धरा,
दुनिया भर की ठोकर खाकर पाई मैंने मधुशाला।।७२।

क्षीण, क्षुद्र, क्षणभंगुर, दुर्बल मानव मिटटी का प्याला,
भरी हुई है जिसके अंदर कटु-मधु जीवन की हाला,
मृत्यु बनी है निर्दय साकी अपने शत-शत कर फैला,
काल प्रबल है पीनेवाला, संसृति है यह मधुशाला।।७३।

प्याले सा गढ़ हमें किसी ने भर दी जीवन की हाला,
नशा न भाया, ढाला हमने ले लेकर मधु का प्याला,
जब जीवन का दर्द उभरता उसे दबाते प्याले से,
जगती के पहले साकी से जूझ रही है मधुशाला।।७४।

अपने अंगूरों से तन में हमने भर ली है हाला,
क्या कहते हो, शेख, नरक में हमें तपाएगी ज्वाला,
तब तो मदिरा खूब खिंचेगी और पिएगा भी कोई,
हमें नमक की ज्वाला में भी दीख पड़ेगी मधुशाला।।७५।

यम आएगा लेने जब, तब खूब चलूँगा पी हाला,
पीड़ा, संकट, कष्ट नरक के क्या समझेगा मतवाला,
क्रूर, कठोर, कुटिल, कुविचारी, अन्यायी यमराजों के
डंडों की जब मार पड़ेगी, आड़ करेगी मधुशाला।।७६।

यदि इन अधरों से दो बातें प्रेम भरी करती हाला,
यदि इन खाली हाथों का जी पल भर बहलाता प्याला,
हानि बता, जग, तेरी क्या है, व्यर्थ मुझे बदनाम न कर,
मेरे टूटे दिल का है बस एक खिलौना मधुशाला।।७७।

याद न आए दुखमय जीवन इससे पी लेता हाला,
जग चिंताओं से रहने को मुक्त, उठा लेता प्याला,
शौक, साध के और स्वाद के हेतु पिया जग करता है,
पर मै वह रोगी हूँ जिसकी एक दवा है मधुशाला।।७८।

गिरती जाती है दिन प्रतिदन प्रणयनी प्राणों की हाला
भग्न हुआ जाता दिन प्रतिदन सुभगे मेरा तन प्याला,
रूठ रहा है मुझसे रूपसी, दिन दिन यौवन का साकी
सूख रही है दिन दिन सुन्दरी, मेरी जीवन मधुशाला।।७९।

यम आयेगा साकी बनकर साथ लिए काली हाला,
पी न होश में फिर आएगा सुरा-विसुध यह मतवाला,
यह अंतिम बेहोशी, अंतिम साकी, अंतिम प्याला है,
पथिक, प्यार से पीना इसको फिर न मिलेगी मधुशाला।८०।

ढलक रही है तन के घट से, संगिनी जब जीवन हाला
पत्र गरल का ले जब अंतिम साकी है आनेवाला,
हाथ स्पर्श भूले प्याले का, स्वाद सुरा जीव्हा भूले
कानो में तुम कहती रहना, मधु का प्याला मधुशाला।।८१।

मेरे अधरों पर हो अंतिम वस्तु न तुलसीदल प्याला
मेरी जीव्हा पर हो अंतिम वस्तु न गंगाजल हाला,
मेरे शव के पीछे चलने वालों याद इसे रखना
राम नाम है सत्य न कहना, कहना सच्ची मधुशाला।।८२।

मेरे शव पर वह रोये, हो जिसके आंसू में हाला
आह भरे वो, जो हो सुरिभत मदिरा पी कर मतवाला,
दे मुझको वो कान्धा जिनके पग मद डगमग होते हों
और जलूं उस ठौर जहां पर कभी रही हो मधुशाला।।८३।

और चिता पर जाये उंढेला पात्र न घ्रित का, पर प्याला
कंठ बंधे अंगूर लता में मध्य न जल हो, पर हाला,
प्राण प्रिये यदि श्राध करो तुम मेरा तो ऐसे करना
पीने वालों को बुलवा कऱ खुलवा देना मधुशाला।।८४।

नाम अगर कोई पूछे तो, कहना बस पीनेवाला
काम ढालना, और ढालना सबको मदिरा का प्याला,
जाति प्रिये, पूछे यदि कोई कह देना दीवानों की
धर्म बताना प्यालों की ले माला जपना मधुशाला।।८५।

ज्ञात हुआ यम आने को है ले अपनी काली हाला,
पंडित अपनी पोथी भूला, साधू भूल गया माला,
और पुजारी भूला पूजा, ज्ञान सभी ज्ञानी भूला,
किन्तु न भूला मरकर के भी पीनेवाला मधुशाला।।८६।

यम ले चलता है मुझको तो, चलने दे लेकर हाला,
चलने दे साकी को मेरे साथ लिए कर में प्याला,
स्वर्ग, नरक या जहाँ कहीं भी तेरा जी हो लेकर चल,
ठौर सभी हैं एक तरह के साथ रहे यदि मधुशाला।।८७।

पाप अगर पीना, समदोषी तो तीनों - साकी बाला,
नित्य पिलानेवाला प्याला, पी जानेवाली हाला,
साथ इन्हें भी ले चल मेरे न्याय यही बतलाता है,
कैद जहाँ मैं हूँ, की जाए कैद वहीं पर मधुशाला।।८८।

शांत सकी हो अब तक, साकी, पीकर किस उर की ज्वाला,
'और, और' की रटन लगाता जाता हर पीनेवाला,
कितनी इच्छाएँ हर जानेवाला छोड़ यहाँ जाता!
कितने अरमानों की बनकर कब्र खड़ी है मधुशाला।।८९।

जो हाला मैं चाह रहा था, वह न मिली मुझको हाला,
जो प्याला मैं माँग रहा था, वह न मिला मुझको प्याला,
जिस साकी के पीछे मैं था दीवाना, न मिला साकी,
जिसके पीछे था मैं पागल, हा न मिली वह मधुशाला!।९०।

देख रहा हूँ अपने आगे कब से माणिक-सी हाला,
देख रहा हूँ अपने आगे कब से कंचन का प्याला,
'बस अब पाया!'- कह-कह कब से दौड़ रहा इसके पीछे,
किंतु रही है दूर क्षितिज-सी मुझसे मेरी मधुशाला।।९१।

कभी निराशा का तम घिरता, छिप जाता मधु का प्याला,
छिप जाती मदिरा की आभा, छिप जाती साकीबाला,
कभी उजाला आशा करके प्याला फिर चमका जाती,
आँख मिचौली खेल रही है मुझसे मेरी मधुशाला।।९२।

'आ आगे' कहकर कर पीछे कर लेती साकीबाला,
होंठ लगाने को कहकर हर बार हटा लेती प्याला,
नहीं मुझे मालूम कहाँ तक यह मुझको ले जाएगी,
बढ़ा बढ़ाकर मुझको आगे, पीछे हटती मधुशाला।।९३।

हाथों में आने-आने में, हाय, फिसल जाता प्याला,
अधरों पर आने-आने में हाय, ढुलक जाती हाला,
दुनियावालो, आकर मेरी किस्मत की ख़ूबी देखो,
रह-रह जाती है बस मुझको मिलते-मिलते मधुशाला।।९४।

प्राप्य नही है तो, हो जाती लुप्त नहीं फिर क्यों हाला,
प्राप्य नही है तो, हो जाता लुप्त नहीं फिर क्यों प्याला,
दूर न इतनी हिम्मत हारुँ, पास न इतनी पा जाऊँ,
व्यर्थ मुझे दौड़ाती मरु में मृगजल बनकर मधुशाला।।९५।

मिले न, पर, ललचा ललचा क्यों आकुल करती है हाला,
मिले न, पर, तरसा तरसाकर क्यों तड़पाता है प्याला,
हाय, नियति की विषम लेखनी मस्तक पर यह खोद गई
'दूर रहेगी मधु की धारा, पास रहेगी मधुशाला!'।९६।

मदिरालय में कब से बैठा, पी न सका अब तक हाला,
यत्न सहित भरता हूँ, कोई किंतु उलट देता प्याला,
मानव-बल के आगे निर्बल भाग्य, सुना विद्यालय में,
'भाग्य प्रबल, मानव निर्बल' का पाठ पढ़ाती मधुशाला।।९७।

किस्मत में था खाली खप्पर, खोज रहा था मैं प्याला,
ढूँढ़ रहा था मैं मृगनयनी, किस्मत में थी मृगछाला,
किसने अपना भाग्य समझने में मुझसा धोखा खाया,
किस्मत में था अवघट मरघट, ढूँढ़ रहा था मधुशाला।।९८।

उस प्याले से प्यार मुझे जो दूर हथेली से प्याला,
उस हाला से चाव मुझे जो दूर अधर से है हाला,
प्यार नहीं पा जाने में है, पाने के अरमानों में!
पा जाता तब, हाय, न इतनी प्यारी लगती मधुशाला।।९९।

साकी के पास है तनिक सी श्री, सुख, संपित की हाला,
सब जग है पीने को आतुर ले ले किस्मत का प्याला,
रेल ठेल कुछ आगे बढ़ते, बहुतेरे दबकर मरते,
जीवन का संघर्ष नहीं है, भीड़ भरी है मधुशाला।।१००।

साकी, जब है पास तुम्हारे इतनी थोड़ी सी हाला,
क्यों पीने की अभिलषा से, करते सबको मतवाला,
हम पिस पिसकर मरते हैं, तुम छिप छिपकर मुसकाते हो,
हाय, हमारी पीड़ा से है क्रीड़ा करती मधुशाला।।१०१।

साकी, मर खपकर यदि कोई आगे कर पाया प्याला,
पी पाया केवल दो बूंदों से न अधिक तेरी हाला,
जीवन भर का, हाय, पिरश्रम लूट लिया दो बूंदों ने,
भोले मानव को ठगने के हेतु बनी है मधुशाला।।१०२।

जिसने मुझको प्यासा रक्खा बनी रहे वह भी हाला,
जिसने जीवन भर दौड़ाया बना रहे वह भी प्याला,
मतवालों की जिह्वा से हैं कभी निकलते शाप नहीं,
दुखी बनाया जिसने मुझको सुखी रहे वह मधुशाला!।१०३।

नहीं चाहता, आगे बढ़कर छीनूँ औरों की हाला,
नहीं चाहता, धक्के देकर, छीनूँ औरों का प्याला,
साकी, मेरी ओर न देखो मुझको तनिक मलाल नहीं,
इतना ही क्या कम आँखों से देख रहा हूँ मधुशाला।।१०४।

मद, मदिरा, मधु, हाला सुन-सुन कर ही जब हूँ मतवाला,
क्या गति होगी अधरों के जब नीचे आएगा प्याला,
साकी, मेरे पास न आना मैं पागल हो जाऊँगा,
प्यासा ही मैं मस्त, मुबारक हो तुमको ही मधुशाला।।१०५।

क्या मुझको आवश्यकता है साकी से माँगूँ हाला,
क्या मुझको आवश्यकता है साकी से चाहूँ प्याला,
पीकर मदिरा मस्त हुआ तो प्यार किया क्या मदिरा से!
मैं तो पागल हो उठता हूँ सुन लेता यदि मधुशाला।।१०६।

देने को जो मुझे कहा था दे न सकी मुझको हाला,
देने को जो मुझे कहा था दे न सका मुझको प्याला,
समझ मनुज की दुर्बलता मैं कहा नहीं कुछ भी करता,
किन्तु स्वयं ही देख मुझे अब शरमा जाती मधुशाला।।१०७।

एक समय संतुष्ट बहुत था पा मैं थोड़ी-सी हाला,
भोला-सा था मेरा साकी, छोटा-सा मेरा प्याला,
छोटे-से इस जग की मेरे स्वर्ग बलाएँ लेता था,
विस्तृत जग में, हाय, गई खो मेरी नन्ही मधुशाला!।१०८।

बहुतेरे मदिरालय देखे, बहुतेरी देखी हाला,
भाँति भाँति का आया मेरे हाथों में मधु का प्याला,
एक एक से बढ़कर, सुन्दर साकी ने सत्कार किया,
जँची न आँखों में, पर, कोई पहली जैसी मधुशाला।।१०९।

एक समय छलका करती थी मेरे अधरों पर हाला,
एक समय झूमा करता था मेरे हाथों पर प्याला,
एक समय पीनेवाले, साकी आलिंगन करते थे,
आज बनी हूँ निर्जन मरघट, एक समय थी मधुशाला।।११०।

जला हृदय की भट्टी खींची मैंने आँसू की हाला,
छलछल छलका करता इससे पल पल पलकों का प्याला,
आँखें आज बनी हैं साकी, गाल गुलाबी पी होते,
कहो न विरही मुझको, मैं हूँ चलती फिरती मधुशाला!।१११।

कितनी जल्दी रंग बदलती है अपना चंचल हाला,
कितनी जल्दी घिसने लगता हाथों में आकर प्याला,
कितनी जल्दी साकी का आकर्षण घटने लगता है,
प्रात नहीं थी वैसी, जैसी रात लगी थी मधुशाला।।११२।

बूँद बूँद के हेतु कभी तुझको तरसाएगी हाला,
कभी हाथ से छिन जाएगा तेरा यह मादक प्याला,
पीनेवाले, साकी की मीठी बातों में मत आना,
मेरे भी गुण यों ही गाती एक दिवस थी मधुशाला।।११३।

छोड़ा मैंने पथ मतों को तब कहलाया मतवाला,
चली सुरा मेरा पग धोने तोड़ा जब मैंने प्याला,
अब मानी मधुशाला मेरे पीछे पीछे फिरती है,
क्या कारण? अब छोड़ दिया है मैंने जाना मधुशाला।।११४।

यह न समझना, पिया हलाहल मैंने, जब न मिली हाला,
तब मैंने खप्पर अपनाया ले सकता था जब प्याला,
जले हृदय को और जलाना सूझा, मैंने मरघट को
अपनाया जब इन चरणों में लोट रही थी मधुशाला।।११५।

कितनी आई और गई पी इस मदिरालय में हाला,
टूट चुकी अब तक कितने ही मादक प्यालों की माला,
कितने साकी अपना अपना काम खतम कर दूर गए,
कितने पीनेवाले आए, किन्तु वही है मधुशाला।।११६।

कितने होठों को रक्खेगी याद भला मादक हाला,
कितने हाथों को रक्खेगा याद भला पागल प्याला,
कितनी शक्लों को रक्खेगा याद भला भोला साकी,
कितने पीनेवालों में है एक अकेली मधुशाला।।११७।

दर दर घूम रहा था जब मैं चिल्लाता - हाला! हाला!
मुझे न मिलता था मदिरालय, मुझे न मिलता था प्याला,
मिलन हुआ, पर नहीं मिलनसुख लिखा हुआ था किस्मत में,
मैं अब जमकर बैठ गया हूँ, घूम रही है मधुशाला।।११८।

मैं मदिरालय के अंदर हूँ, मेरे हाथों में प्याला,
प्याले में मदिरालय बिंबित करनेवाली है हाला,
इस उधेड़-बुन में ही मेरा सारा जीवन बीत गया -
मैं मधुशाला के अंदर या मेरे अंदर मधुशाला!।११९।

किसे नहीं पीने से नाता, किसे नहीं भाता प्याला,
इस जगती के मदिरालय में तरह-तरह की है हाला,
अपनी-अपनी इच्छा के अनुसार सभी पी मदमाते,
एक सभी का मादक साकी, एक सभी की मधुशाला।।१२०।

वह हाला, कर शांत सके जो मेरे अंतर की ज्वाला,
जिसमें मैं बिंबित-प्रतिबिंबित प्रतिपल, वह मेरा प्याला,
मधुशाला वह नहीं जहाँ पर मदिरा बेची जाती है,
भेंट जहाँ मस्ती की मिलती मेरी तो वह मधुशाला।।१२१।

मतवालापन हाला से ले मैंने तज दी है हाला,
पागलपन लेकर प्याले से, मैंने त्याग दिया प्याला,
साकी से मिल, साकी में मिल अपनापन मैं भूल गया,
मिल मधुशाला की मधुता में भूल गया मैं मधुशाला।।१२२।

मदिरालय के द्वार ठोंकता किस्मत का छूंछा प्याला,
गहरी, ठंडी सांसें भर भर कहता था हर मतवाला,
कितनी थोड़ी सी यौवन की हाला, हा, मैं पी पाया!
बंद हो गई कितनी जल्दी मेरी जीवन मधुशाला।।१२३।

कहाँ गया वह स्वर्गिक साकी, कहाँ गयी सुरिभत हाला,
कहाँ गया स्वपिनल मदिरालय, कहाँ गया स्वर्णिम प्याला!
पीनेवालों ने मदिरा का मूल्य, हाय, कब पहचाना?
फूट चुका जब मधु का प्याला, टूट चुकी जब मधुशाला।।१२४।

अपने युग में सबको अनुपम ज्ञात हुई अपनी हाला,
अपने युग में सबको अदभुत ज्ञात हुआ अपना प्याला,
फिर भी वृद्धों से जब पूछा एक यही उत्तर पाया -
अब न रहे वे पीनेवाले, अब न रही वह मधुशाला!।१२५।

'मय' को करके शुद्ध दिया अब नाम गया उसको, 'हाला'
'मीना' को 'मधुपात्र' दिया 'सागर' को नाम गया 'प्याला',
क्यों न मौलवी चौंकें, बिचकें तिलक-त्रिपुंडी पंडित जी
'मय-महिफल' अब अपना ली है मैंने करके 'मधुशाला'।।१२६।

कितने मर्म जता जाती है बार-बार आकर हाला,
कितने भेद बता जाता है बार-बार आकर प्याला,
कितने अर्थों को संकेतों से बतला जाता साकी,
फिर भी पीनेवालों को है एक पहेली मधुशाला।।१२७।

जितनी दिल की गहराई हो उतना गहरा है प्याला,
जितनी मन की मादकता हो उतनी मादक है हाला,
जितनी उर की भावुकता हो उतना सुन्दर साकी है,
जितना ही जो रिसक, उसे है उतनी रसमय मधुशाला।।१२८।

जिन अधरों को छुए, बना दे मस्त उन्हें मेरी हाला,
जिस कर को छू दे, कर दे विक्षिप्त उसे मेरा प्याला,
आँख चार हों जिसकी मेरे साकी से दीवाना हो,
पागल बनकर नाचे वह जो आए मेरी मधुशाला।।१२९।

हर जिव्हा पर देखी जाएगी मेरी मादक हाला
हर कर में देखा जाएगा मेरे साकी का प्याला
हर घर में चर्चा अब होगी मेरे मधुविक्रेता की
हर आंगन में गमक उठेगी मेरी सुरिभत मधुशाला।।१३०।

मेरी हाला में सबने पाई अपनी-अपनी हाला,
मेरे प्याले में सबने पाया अपना-अपना प्याला,
मेरे साकी में सबने अपना प्यारा साकी देखा,
जिसकी जैसी रुचि थी उसने वैसी देखी मधुशाला।।१३१।

यह मदिरालय के आँसू हैं, नहीं-नहीं मादक हाला,
यह मदिरालय की आँखें हैं, नहीं-नहीं मधु का प्याला,
किसी समय की सुखदस्मृति है साकी बनकर नाच रही,
नहीं-नहीं कवि का हृदयांगण, यह विरहाकुल मधुशाला।।१३२।

कुचल हसरतें कितनी अपनी, हाय, बना पाया हाला,
कितने अरमानों को करके ख़ाक बना पाया प्याला!
पी पीनेवाले चल देंगे, हाय, न कोई जानेगा,
कितने मन के महल ढहे तब खड़ी हुई यह मधुशाला!।१३३।

विश्व तुम्हारे विषमय जीवन में ला पाएगी हाला
यदि थोड़ी-सी भी यह मेरी मदमाती साकीबाला,
शून्य तुम्हारी घड़ियाँ कुछ भी यदि यह गुंजित कर पाई,
जन्म सफल समझेगी जग में अपना मेरी मधुशाला।।१३४।

बड़े-बड़े नाज़ों से मैंने पाली है साकीबाला,
कलित कल्पना का ही इसने सदा उठाया है प्याला,
मान-दुलारों से ही रखना इस मेरी सुकुमारी को,
विश्व, तुम्हारे हाथों में अब सौंप रहा हूँ मधुशाला।।१३५।

पिरिशष्ट से

स्वयं नहीं पीता, औरों को, किन्तु पिला देता हाला,
स्वयं नहीं छूता, औरों को, पर पकड़ा देता प्याला,
पर उपदेश कुशल बहुतेरों से मैंने यह सीखा है,
स्वयं नहीं जाता, औरों को पहुंचा देता मधुशाला।

मैं कायस्थ कुलोदभव मेरे पुरखों ने इतना ढ़ाला,
मेरे तन के लोहू में है पचहत्तर प्रतिशत हाला,
पुश्तैनी अधिकार मुझे है मदिरालय के आँगन पर,
मेरे दादों परदादों के हाथ बिकी थी मधुशाला।

बहुतों के सिर चार दिनों तक चढ़कर उतर गई हाला,
बहुतों के हाथों में दो दिन छलक झलक रीता प्याला,
पर बढ़ती तासीर सुरा की साथ समय के, इससे ही
और पुरानी होकर मेरी और नशीली मधुशाला।

पितृ पक्ष में पुत्र उठाना अर्ध्य न कर में, पर प्याला
बैठ कहीं पर जाना, गंगा सागर में भरकर हाला
किसी जगह की मिटटी भीगे, तृप्ति मुझे मिल जाएगी
तर्पण अर्पण करना मुझको, पढ़ पढ़ कर के मधुशाला।
- हरिवंशराय बच्चन

बुधवार, 7 अगस्त 2019

सरस्वती विद्या मंदिर इंटर कॉलेज नई टिहरी की अभिभावकों से अपील.

Rekha Dobhal, TGT Science.
 अभिभावकों से अपील

  •  बच्चों को मोबाइल फोन का उपयोग न करने दें, आवश्यक होने पर अपनी देखरेख में ही मोबाइल का उपयोग करने दिया जाए. बच्चों को साइबर अपराधों के प्रति भी जागरूक बनायें.
  •  शाम 8:00 बजे तक टीवी बंद कर दें। टीवी पर आठ बजे के बाद आपके बच्चे से ज्यादा महत्वपूर्ण कुछ नहीं होता है। बच्चों के लिए समय देना बहुत जरूरी है.
  • अपने बच्चे की स्कूल डायरी और गृह कार्य देखने के लिए 30-45 मिनट निकालिए। उसके गृहकार्य पूरे कराइए। साथ ही समय समय पर स्कूल बैग और किताब-कापियों को देखना न भूलें. 
  • रोज सभी विषयों में उनका प्रदर्शन देखिए। उन विषयों का खास ध्यान रखिए जिसमें वह कमजोर है / अच्छा कार्य नहीं कर रहा है। 
  • उनकी बुनियादी शिक्षा भविष्य के लिए बहुत महत्वपूर्ण है. इसलिए बच्चे को भविष्य के लिए लक्ष्य निर्धारित करने के लिए प्रेरित करें.
  •  उन्हें सुबह जल्दी उठने की आदत डालिए 5:30 बजे तक बच्चों को उठाकर नित्यक्रम के बाद कुछ देर योग, मेडिटेशन व ध्यान लगाने के लिए प्रेरित करें। 
  • सोने के समय अपने बच्चों को पंचतंत्र, अकबर-बीरबल, तेनाली राम आदि की कहानी, किस्से और प्रेरक प्रसंग अवश्य सुनाइए। 
  •   हर साल गर्मी की छुट्टी में (अपने बजट के अनुसार) कहीं घूमने जाइए। इससे वे अलग लोगों के साथ और अलग जगहों पर रहना सीखते हैं। 
  •  अपने बच्चे की प्रतिभा का पता लगाइए और उसे इसे निखारने में सहायता कीजिए. वह किसी विषय, संगीत, खेल, अभिनय, चित्रांकन, नृत्य आदि में दिलचस्पी रख सकता है। इससे उसका जीवन आनंददायक हो जाएगा। 
  • उसे सीखाइए कि प्रदूषण फ़ैलाने वाली चीजों व प्लास्टिक का उपयोग नहीं करना चाहिए हर इतवार कोशिश कीजिए कि खाने की कोई ऐसी चीज बनाएं जो उन्हें पसंद है। उन्हें इसमें अपनी मदद करने के लिए कहिए।
  • प्रत्येक बच्चे जन्म से वैज्ञानिक होते हैं उनके पास ढेरों सवाल होते हैं. मुमकिन है हम जवाब न दें पायें, पर जानकारी न होने के कारण हमें सवाल पर गुस्सा नहीं दिखाना चाहिए। उत्तर पता करने की कोशिश कीजिए औऱ उन्हें बताइए.
  •  उन्हें अनुशासन और जीने के बेहतर तरीकों के बारे में बताइए। सही गलत के बारे में समझाइए.
  •  बच्चे को अपने काम में सहायता करने के लिए कहिए। इसमें खाना बनाना, स्वच्छता व सफाई, चीजों को व्यवस्थित करना आदि शामिल है.
  •   बच्चों को नशीली बस्तुओं के सेवन से होने वाले बुरे परिणामों की जानकारी दें. अच्छी शिक्षा के साथ बच्चों को नशे की प्रवृति से बचाना अभिभावकों और शिक्षकों सहित आमलोगों का दायित्व होना चाहिए.
  • और सबसे महत्त्वपूर्ण कि हमें अपने बच्चों को शिक्षा के साथ अच्छे संस्कार भी देने चाहिए ताकि वो जीवन में सफल और सही इन्सान बन सके।याद रखे की अच्छी शिक्षा प्राप्त करने वाले अनेक लोग उच्च पदों पर तो आसीन हो जाते हैं किन्तु अच्छे संस्कारों के अभाव में भ्रष्टाचार और अनैतिक कृत्यों में लिप्त हो जाते हैं. इसलिए अच्छी शिक्षा के साथ अच्छे संस्कार बहुत जरूरी हैं.
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