Snowfall

बुधवार, 21 अगस्त 2019

सीबीएससी से सम्बद्ध होगा विद्या मंदिर इंटर कॉलेज नई टिहरी। मातृभारती की कार्यकारिणी का भी हुआ गठन।


      विद्या भारती द्वारा संचालित विद्या मंदिर इंटर कॉलेज नई टिहरी शीघ्र ही सीबीएसई से संबद्ध होने जा रहा है। उक्त आशय की जानकारी देते हुए प्रधानाचार्य देवी प्रसाद नौटियाल ने विद्यालय विकास हेतु समस्त अभिभावक माताओं से विद्यार्थियों के भविष्य को संवारने के लिए अपना अमूल्य योगदान देने का आवाहन किया है मातृशक्ति को विद्यालय की मुख्यधारा से जोड़ने के उद्देश्य से मातृभारती नामक समिति का गठन किया गया है।  इस मौके पर नगर की अनेक महिलाओं ने विद्यालय के शैक्षिक उन्नयन के लिए कई उपयोगी सुझाव दिए हैं।
 नई टिहरी स्थित सरस्वती विद्या मंदिर इंटर कॉलेज अगले सत्र से केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा परिषद यानी सीबीएसई द्वारा सम्बद्ध होने जा रहा है। उक्त आशय की जानकारी देते हुए विद्यालय के प्रधानाचार्य देवी प्रसाद नौटियाल ने बताया कि समय की जरूरत और देशभर में पाठ्यक्रम की समरूपता को देखते हुए विद्यालय ने सीबीएसई से सम्बद्धता लेने का निर्णय किया है और इसके लिए विधिवत प्रक्रिया भी शुरू कर दी गयी है। सीबीएसई की मान्यता के लिए विद्यालय सभी मानक पूरे करता है और सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो अगले शैक्षणिक सत्र में विद्यालय सीबीएसई से मान्यता प्राप्त कर लेगा।
       यह जानकारी विद्यालय के छात्र-छात्राओं की अभिभावक माताओं की एक बैठक में देते हुए प्रधानाचार्य ने कहा कि विद्यार्थियों के जीवन में शिक्षक का अत्यंत योगदान होता है और किसी भी बच्चे के लिए मां उसकी पहली शिक्षक होती है। मां अपनी जीवन पर्यंत अपने बच्चों को ऐसी बेमिसाल शिक्षा देती है जो दुनिया में कोई अन्य शिक्षक नहीं दे सकता। उन्होंने कहा कि बच्चों की शिक्षा दीक्षा के साथ ही महिलाओं का योगदान समाज और राष्ट्र निर्माण में आदिकाल से रहा है और बच्चों के साथ मां का अटूट संबंध होता है। बच्चों की भावना, उनके गुणों और उनकी समस्याओं को मां से बेहतर कोई नहीं समझ सकता। इसलिए अभिभावक माताओं को विद्यार्थियों के शैक्षिक उन्नयन के लिए विद्यालय और शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ा जाना बहुत आवश्यक है। इसी उद्देश्य के साथ विद्यालय में मातृभारती नामक समिति का गठन किया जा रहा है।
   इस मौके पर विद्यालय की शिक्षिका रेखा डोभाल में ने कहा कि महिलाएं आज समाज व राष्ट्र में एक सजग प्रहरी के रूप में अपनी बेहतर भूमिकाएं निभा रही है और मातृशक्ति को विद्यालय की मुख्यधारा के साथ जोड़ा जाना एक अनोखा नवाचार साबित हो सकता है। उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों के प्रति माता पिता और शिक्षकों के साथ ही समाज और समुदाय का भी बड़ा उत्तरदायित्व होता है। बच्चों को अच्छी शिक्षा के साथ अच्छे संस्कार दिए जाने जरूरी है और इस रूप में महिलाएं क्रांतिकारी परिवर्तन ला सकती हैं। इस मौके पर सर्व सहमति से विजयलक्ष्मी उनियाल को अध्यक्ष, संगीता सेमवाल उपाध्यक्ष, संगीता नौटियाल मंत्री, लक्ष्मी कुमाई सह मंत्री, विजयलक्ष्मी नौटियाल कोषाध्यक्ष, और रेखा डोभाल को सचिव चुना गया। जबकि रजनी शाह, सरोजिनी देवी,  सुचिता चौहान, सुनीता राणा, गुटमा देवी, सरोजिनी नेगी, आशा चमोली, आदि को कार्यकारिणी सदस्य के रूप में मनोनीत किया गया। नवनिर्वाचित कार्यकारिणी की पदाधिकारियों ने विद्यालय परिवार के इस अनोखे प्रयोग की सराहना करते हुए आभार व्यक्त किया है। मातृभारती समिति की अध्यक्ष विजयलक्ष्मी उनियाल ने कहां है की समिति विद्यालय और  विद्यार्थियों की शैक्षणिक प्रगति के लिए हर संभव प्रयास करेगी। उन्होंने सभी अभिभावक माताओं से मातृभारती के माध्यम से विद्यालय की मुख्यधारा से जुड़ने का आग्रह किया है। इस मौके पर समिति के पदाधिकारियों द्वारा विद्यालय के विकास के लिए अनेक सुझाव प्रधानाचार्य और शिक्षकों को दिए हैं। समिति की अगली बैठक सितंबर माह में आयोजित की जाएगी। मातृभारती Whatsapp ग्रुप से जुड़ने के लिए (केवल महिला अभिभावक) यहां क्लिक करें। ग्रुप पर जुड़कर अपना पूरा परिचय दें। परिचय न देने वाले सदस्यों को ग्रुप से हटा दिया जाएगा।

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रविवार, 18 अगस्त 2019

मधुशाला

मधुशाला
मृदु भावों के अंगूरों की आज बना लाया हाला,
प्रियतम, अपने ही हाथों से आज पिलाऊँगा प्याला,
पहले भोग लगा लूँ तेरा फिर प्रसाद जग पाएगा,
सबसे पहले तेरा स्वागत करती मेरी मधुशाला।।१।

प्यास तुझे तो, विश्व तपाकर पूर्ण निकालूँगा हाला,
एक पाँव से साकी बनकर नाचूँगा लेकर प्याला,
जीवन की मधुता तो तेरे ऊपर कब का वार चुका,
आज निछावर कर दूँगा मैं तुझ पर जग की मधुशाला।।२।

प्रियतम, तू मेरी हाला है, मैं तेरा प्यासा प्याला,
अपने को मुझमें भरकर तू बनता है पीनेवाला,
मैं तुझको छक छलका करता, मस्त मुझे पी तू होता,
एक दूसरे की हम दोनों आज परस्पर मधुशाला।।३।

भावुकता अंगूर लता से खींच कल्पना की हाला,
कवि साकी बनकर आया है भरकर कविता का प्याला,
कभी न कण-भर खाली होगा लाख पिएँ, दो लाख पिएँ!
पाठकगण हैं पीनेवाले, पुस्तक मेरी मधुशाला।।४।

मधुर भावनाओं की सुमधुर नित्य बनाता हूँ हाला,
भरता हूँ इस मधु से अपने अंतर का प्यासा प्याला,
उठा कल्पना के हाथों से स्वयं उसे पी जाता हूँ,
अपने ही में हूँ मैं साकी, पीनेवाला, मधुशाला।।५।

मदिरालय जाने को घर से चलता है पीनेवला,
'किस पथ से जाऊँ?' असमंजस में है वह भोलाभाला,
अलग-अलग पथ बतलाते सब पर मैं यह बतलाता हूँ -
'राह पकड़ तू एक चला चल, पा जाएगा मधुशाला।'। ६।

चलने ही चलने में कितना जीवन, हाय, बिता डाला!
'दूर अभी है', पर, कहता है हर पथ बतलानेवाला,
हिम्मत है न बढूँ आगे को साहस है न फिरुँ पीछे,
किंकर्तव्यविमूढ़ मुझे कर दूर खड़ी है मधुशाला।।७।

मुख से तू अविरत कहता जा मधु, मदिरा, मादक हाला,
हाथों में अनुभव करता जा एक ललित कल्पित प्याला,
ध्यान किए जा मन में सुमधुर सुखकर, सुंदर साकी का,
और बढ़ा चल, पथिक, न तुझको दूर लगेगी मधुशाला।।८।

मदिरा पीने की अभिलाषा ही बन जाए जब हाला,
अधरों की आतुरता में ही जब आभासित हो प्याला,
बने ध्यान ही करते-करते जब साकी साकार, सखे,
रहे न हाला, प्याला, साकी, तुझे मिलेगी मधुशाला।।९।

सुन, कलकल़ , छलछल़ मधुघट से गिरती प्यालों में हाला,
सुन, रूनझुन रूनझुन चल वितरण करती मधु साकीबाला,
बस आ पहुंचे, दुर नहीं कुछ, चार कदम अब चलना है,
चहक रहे, सुन, पीनेवाले, महक रही, ले, मधुशाला।।१०।

जलतरंग बजता, जब चुंबन करता प्याले को प्याला,
वीणा झंकृत होती, चलती जब रूनझुन साकीबाला,
डाँट डपट मधुविक्रेता की ध्वनित पखावज करती है,
मधुरव से मधु की मादकता और बढ़ाती मधुशाला।।११।

मेंहदी रंजित मृदुल हथेली पर माणिक मधु का प्याला,
अंगूरी अवगुंठन डाले स्वर्ण वर्ण साकीबाला,
पाग बैंजनी, जामा नीला डाट डटे पीनेवाले,
इन्द्रधनुष से होड़ लगाती आज रंगीली मधुशाला।।१२।

हाथों में आने से पहले नाज़ दिखाएगा प्याला,
अधरों पर आने से पहले अदा दिखाएगी हाला,
बहुतेरे इनकार करेगा साकी आने से पहले,
पथिक, न घबरा जाना, पहले मान करेगी मधुशाला।।१३।

लाल सुरा की धार लपट सी कह न इसे देना ज्वाला,
फेनिल मदिरा है, मत इसको कह देना उर का छाला,
दर्द नशा है इस मदिरा का विगत स्मृतियाँ साकी हैं,
पीड़ा में आनंद जिसे हो, आए मेरी मधुशाला।।१४।

जगती की शीतल हाला सी पथिक, नहीं मेरी हाला,
जगती के ठंडे प्याले सा पथिक, नहीं मेरा प्याला,
ज्वाल सुरा जलते प्याले में दग्ध हृदय की कविता है,
जलने से भयभीत न जो हो, आए मेरी मधुशाला।।१५।

बहती हाला देखी, देखो लपट उठाती अब हाला,
देखो प्याला अब छूते ही होंठ जला देनेवाला,
'होंठ नहीं, सब देह दहे, पर पीने को दो बूंद मिले'
ऐसे मधु के दीवानों को आज बुलाती मधुशाला।।१६।

धर्मग्रन्थ सब जला चुकी है, जिसके अंतर की ज्वाला,
मंदिर, मसजिद, गिरिजे, सब को तोड़ चुका जो मतवाला,
पंडित, मोमिन, पादिरयों के फंदों को जो काट चुका,
कर सकती है आज उसी का स्वागत मेरी मधुशाला।।१७।

लालायित अधरों से जिसने, हाय, नहीं चूमी हाला,
हर्ष-विकंपित कर से जिसने, हा, न छुआ मधु का प्याला,
हाथ पकड़ लज्जित साकी को पास नहीं जिसने खींचा,
व्यर्थ सुखा डाली जीवन की उसने मधुमय मधुशाला।।१८।

बने पुजारी प्रेमी साकी, गंगाजल पावन हाला,
रहे फेरता अविरत गति से मधु के प्यालों की माला'
'और लिये जा, और पीये जा', इसी मंत्र का जाप करे'
मैं शिव की प्रतिमा बन बैठूं, मंदिर हो यह मधुशाला।।१९।

बजी न मंदिर में घड़ियाली, चढ़ी न प्रतिमा पर माला,
बैठा अपने भवन मुअज्ज़िन देकर मस्जिद में ताला,
लुटे ख़जाने नरपितयों के गिरीं गढ़ों की दीवारें,
रहें मुबारक पीनेवाले, खुली रहे यह मधुशाला।।२०।

बड़े बड़े परिवार मिटें यों, एक न हो रोनेवाला,
हो जाएँ सुनसान महल वे, जहाँ थिरकतीं सुरबाला,
राज्य उलट जाएँ, भूपों की भाग्य सुलक्ष्मी सो जाए,
जमे रहेंगे पीनेवाले, जगा करेगी मधुशाला।।२१।

सब मिट जाएँ, बना रहेगा सुन्दर साकी, यम काला,
सूखें सब रस, बने रहेंगे, किन्तु, हलाहल औ' हाला,
धूमधाम औ' चहल पहल के स्थान सभी सुनसान बनें,
जगा करेगा अविरत मरघट, जगा करेगी मधुशाला।।२२।

भुरा सदा कहलायेगा जग में बाँका, मदचंचल प्याला,
छैल छबीला, रसिया साकी, अलबेला पीनेवाला,
पटे कहाँ से, मधु औ' जग की जोड़ी ठीक नहीं,
जग जर्जर प्रतिदन, प्रतिक्षण, पर नित्य नवेली मधुशाला।।२३।

बिना पिये जो मधुशाला को बुरा कहे, वह मतवाला,
पी लेने पर तो उसके मुह पर पड़ जाएगा ताला,
दास द्रोहियों दोनों में है जीत सुरा की, प्याले की,
विश्वविजयिनी बनकर जग में आई मेरी मधुशाला।।२४।

हरा भरा रहता मदिरालय, जग पर पड़ जाए पाला,
वहाँ मुहर्रम का तम छाए, यहाँ होलिका की ज्वाला,
स्वर्ग लोक से सीधी उतरी वसुधा पर, दुख क्या जाने,
पढ़े मर्सिया दुनिया सारी, ईद मनाती मधुशाला।।२५।

एक बरस में, एक बार ही जगती होली की ज्वाला,
एक बार ही लगती बाज़ी, जलती दीपों की माला,
दुनियावालों, किन्तु, किसी दिन आ मदिरालय में देखो,
दिन को होली, रात दिवाली, रोज़ मनाती मधुशाला।।२६।

नहीं जानता कौन, मनुज आया बनकर पीनेवाला,
कौन अपिरिचत उस साकी से, जिसने दूध पिला पाला,
जीवन पाकर मानव पीकर मस्त रहे, इस कारण ही,
जग में आकर सबसे पहले पाई उसने मधुशाला।।२७।

बनी रहें अंगूर लताएँ जिनसे मिलती है हाला,
बनी रहे वह मिटटी जिससे बनता है मधु का प्याला,
बनी रहे वह मदिर पिपासा तृप्त न जो होना जाने,
बनें रहें ये पीने वाले, बनी रहे यह मधुशाला।।२८।

सकुशल समझो मुझको, सकुशल रहती यदि साकीबाला,
मंगल और अमंगल समझे मस्ती में क्या मतवाला,
मित्रों, मेरी क्षेम न पूछो आकर, पर मधुशाला की,
कहा करो 'जय राम' न मिलकर, कहा करो 'जय मधुशाला'।।२९।

सूर्य बने मधु का विक्रेता, सिंधु बने घट, जल, हाला,
बादल बन-बन आए साकी, भूमि बने मधु का प्याला,
झड़ी लगाकर बरसे मदिरा रिमझिम, रिमझिम, रिमझिम कर,
बेलि, विटप, तृण बन मैं पीऊँ, वर्षा ऋतु हो मधुशाला।।३०।

तारक मणियों से सज्जित नभ बन जाए मधु का प्याला,
सीधा करके भर दी जाए उसमें सागरजल हाला,
मत्त समीरण साकी बनकर अधरों पर छलका जाए,
फैले हों जो सागर तट से विश्व बने यह मधुशाला।।३१।

अधरों पर हो कोई भी रस जिहवा पर लगती हाला,
भाजन हो कोई हाथों में लगता रक्खा है प्याला,
हर सूरत साकी की सूरत में परिवर्तित हो जाती,
आँखों के आगे हो कुछ भी, आँखों में है मधुशाला।।३२।

पौधे आज बने हैं साकी ले ले फूलों का प्याला,
भरी हुई है जिसके अंदर पिरमल-मधु-सुरिभत हाला,
माँग माँगकर भ्रमरों के दल रस की मदिरा पीते हैं,
झूम झपक मद-झंपित होते, उपवन क्या है मधुशाला!।३३।

प्रति रसाल तरू साकी सा है, प्रति मंजरिका है प्याला,
छलक रही है जिसके बाहर मादक सौरभ की हाला,
छक जिसको मतवाली कोयल कूक रही डाली डाली
हर मधुऋतु में अमराई में जग उठती है मधुशाला।।३४।

मंद झकोरों के प्यालों में मधुऋतु सौरभ की हाला
भर भरकर है अनिल पिलाता बनकर मधु-मद-मतवाला,
हरे हरे नव पल्लव, तरूगण, नूतन डालें, वल्लरियाँ,
छक छक, झुक झुक झूम रही हैं, मधुबन में है मधुशाला।।३५।

साकी बन आती है प्रातः जब अरुणा ऊषा बाला,
तारक-मणि-मंडित चादर दे मोल धरा लेती हाला,
अगणित कर-किरणों से जिसको पी, खग पागल हो गाते,
प्रति प्रभात में पूर्ण प्रकृति में मुखिरत होती मधुशाला।।३६।

उतर नशा जब उसका जाता, आती है संध्या बाला,
बड़ी पुरानी, बड़ी नशीली नित्य ढला जाती हाला,
जीवन के संताप शोक सब इसको पीकर मिट जाते
सुरा-सुप्त होते मद-लोभी जागृत रहती मधुशाला।।३७।

अंधकार है मधुविक्रेता, सुन्दर साकी शशिबाला
किरण किरण में जो छलकाती जाम जुम्हाई का हाला,
पीकर जिसको चेतनता खो लेने लगते हैं झपकी
तारकदल से पीनेवाले, रात नहीं है, मधुशाला।।३८।

किसी ओर मैं आँखें फेरूँ, दिखलाई देती हाला
किसी ओर मैं आँखें फेरूँ, दिखलाई देता प्याला,
किसी ओर मैं देखूं, मुझको दिखलाई देता साकी
किसी ओर देखूं, दिखलाई पड़ती मुझको मधुशाला।।३९।

साकी बन मुरली आई साथ लिए कर में प्याला,
जिनमें वह छलकाती लाई अधर-सुधा-रस की हाला,
योगिराज कर संगत उसकी नटवर नागर कहलाए,
देखो कैसों-कैसों को है नाच नचाती मधुशाला।।४०।

वादक बन मधु का विक्रेता लाया सुर-सुमधुर-हाला,
रागिनियाँ बन साकी आई भरकर तारों का प्याला,
विक्रेता के संकेतों पर दौड़ लयों, आलापों में,
पान कराती श्रोतागण को, झंकृत वीणा मधुशाला।।४१।

चित्रकार बन साकी आता लेकर तूली का प्याला,
जिसमें भरकर पान कराता वह बहु रस-रंगी हाला,
मन के चित्र जिसे पी-पीकर रंग-बिरंगे हो जाते,
चित्रपटी पर नाच रही है एक मनोहर मधुशाला।।४२।

घन श्यामल अंगूर लता से खिंच खिंच यह आती हाला,
अरूण-कमल-कोमल कलियों की प्याली, फूलों का प्याला,
लोल हिलोरें साकी बन बन माणिक मधु से भर जातीं,
हंस मत्त होते पी पीकर मानसरोवर मधुशाला।।४३।

हिम श्रेणी अंगूर लता-सी फैली, हिम जल है हाला,
चंचल नदियाँ साकी बनकर, भरकर लहरों का प्याला,
कोमल कूर-करों में अपने छलकाती निशिदिन चलतीं,
पीकर खेत खड़े लहराते, भारत पावन मधुशाला।।४४।

धीर सुतों के हृदय रक्त की आज बना रक्तिम हाला,
वीर सुतों के वर शीशों का हाथों में लेकर प्याला,
अति उदार दानी साकी है आज बनी भारतमाता,
स्वतंत्रता है तृषित कालिका बलिवेदी है मधुशाला।।४५।

दुतकारा मस्जिद ने मुझको कहकर है पीनेवाला,
ठुकराया ठाकुरद्वारे ने देख हथेली पर प्याला,
कहाँ ठिकाना मिलता जग में भला अभागे काफिर को?
शरणस्थल बनकर न मुझे यदि अपना लेती मधुशाला।।४६।

पथिक बना मैं घूम रहा हूँ, सभी जगह मिलती हाला,
सभी जगह मिल जाता साकी, सभी जगह मिलता प्याला,
मुझे ठहरने का, हे मित्रों, कष्ट नहीं कुछ भी होता,
मिले न मंदिर, मिले न मस्जिद, मिल जाती है मधुशाला।।४७।

सजें न मस्जिद और नमाज़ी कहता है अल्लाताला,
सजधजकर, पर, साकी आता, बन ठनकर, पीनेवाला,
शेख, कहाँ तुलना हो सकती मस्जिद की मदिरालय से
चिर विधवा है मस्जिद तेरी, सदा सुहागिन मधुशाला।।४८।

बजी नफ़ीरी और नमाज़ी भूल गया अल्लाताला,
गाज गिरी, पर ध्यान सुरा में मग्न रहा पीनेवाला,
शेख, बुरा मत मानो इसको, साफ़ कहूँ तो मस्जिद को
अभी युगों तक सिखलाएगी ध्यान लगाना मधुशाला!।४९।

मुसलमान औ' हिन्दू है दो, एक, मगर, उनका प्याला,
एक, मगर, उनका मदिरालय, एक, मगर, उनकी हाला,
दोनों रहते एक न जब तक मस्जिद मन्दिर में जाते,
बैर बढ़ाते मस्जिद मन्दिर मेल कराती मधुशाला!।५०।

कोई भी हो शेख नमाज़ी या पंडित जपता माला,
बैर भाव चाहे जितना हो मदिरा से रखनेवाला,
एक बार बस मधुशाला के आगे से होकर निकले,
देखूँ कैसे थाम न लेती दामन उसका मधुशाला!।५१।

और रसों में स्वाद तभी तक, दूर जभी तक है हाला,
इतरा लें सब पात्र न जब तक, आगे आता है प्याला,
कर लें पूजा शेख, पुजारी तब तक मस्जिद मन्दिर में
घूँघट का पट खोल न जब तक झाँक रही है मधुशाला।।५२।

आज करे परहेज़ जगत, पर, कल पीनी होगी हाला,
आज करे इन्कार जगत पर कल पीना होगा प्याला,
होने दो पैदा मद का महमूद जगत में कोई, फिर
जहाँ अभी हैं मन्दिर मस्जिद वहाँ बनेगी मधुशाला।।५३।

यज्ञ अग्नि सी धधक रही है मधु की भटठी की ज्वाला,
ऋषि सा ध्यान लगा बैठा है हर मदिरा पीने वाला,
मुनि कन्याओं सी मधुघट ले फिरतीं साकीबालाएँ,
किसी तपोवन से क्या कम है मेरी पावन मधुशाला।।५४।

सोम सुरा पुरखे पीते थे, हम कहते उसको हाला,
द्रोणकलश जिसको कहते थे, आज वही मधुघट आला,
वेदिवहित यह रस्म न छोड़ो वेदों के ठेकेदारों,
युग युग से है पुजती आई नई नहीं है मधुशाला।।५५।

वही वारूणी जो थी सागर मथकर निकली अब हाला,
रंभा की संतान जगत में कहलाती 'साकीबाला',
देव अदेव जिसे ले आए, संत महंत मिटा देंगे!
किसमें कितना दम खम, इसको खूब समझती मधुशाला।।५६।

कभी न सुन पड़ता, 'इसने, हा, छू दी मेरी हाला',
कभी न कोई कहता, 'उसने जूठा कर डाला प्याला',
सभी जाति के लोग यहाँ पर साथ बैठकर पीते हैं,
सौ सुधारकों का करती है काम अकेले मधुशाला।।५७।

श्रम, संकट, संताप, सभी तुम भूला करते पी हाला,
सबक बड़ा तुम सीख चुके यदि सीखा रहना मतवाला,
व्यर्थ बने जाते हो हिरजन, तुम तो मधुजन ही अच्छे,
ठुकराते हैं मंदिरवाले, पलक बिछाती मधुशाला।।५८।

एक तरह से सबका स्वागत करती है साकीबाला,
अज्ञ विज्ञ में है क्या अंतर हो जाने पर मतवाला,
रंक राव में भेद हुआ है कभी नहीं मदिरालय में,
साम्यवाद की प्रथम प्रचारक है यह मेरी मधुशाला।।५९।

बार बार मैंने आगे बढ़ आज नहीं माँगी हाला,
समझ न लेना इससे मुझको साधारण पीने वाला,
हो तो लेने दो ऐ साकी दूर प्रथम संकोचों को,
मेरे ही स्वर से फिर सारी गूँज उठेगी मधुशाला।।६०।

कल? कल पर विश्वास किया कब करता है पीनेवाला
हो सकते कल कर जड़ जिनसे फिर फिर आज उठा प्याला,
आज हाथ में था, वह खोया, कल का कौन भरोसा है,
कल की हो न मुझे मधुशाला काल कुटिल की मधुशाला।।६१।

आज मिला अवसर, तब फिर क्यों मैं न छकूँ जी-भर हाला
आज मिला मौका, तब फिर क्यों ढाल न लूँ जी-भर प्याला,
छेड़छाड़ अपने साकी से आज न क्यों जी-भर कर लूँ,
एक बार ही तो मिलनी है जीवन की यह मधुशाला।।६२।

आज सजीव बना लो, प्रेयसी, अपने अधरों का प्याला,
भर लो, भर लो, भर लो इसमें, यौवन मधुरस की हाला,
और लगा मेरे होठों से भूल हटाना तुम जाओ,
अथक बनू मैं पीनेवाला, खुले प्रणय की मधुशाला।।६३।

सुमुखी तुम्हारा, सुन्दर मुख ही, मुझको कन्चन का प्याला
छलक रही है जिसमें माणिक रूप मधुर मादक हाला,
मैं ही साकी बनता, मैं ही पीने वाला बनता हूँ
जहाँ कहीं मिल बैठे हम तुम़ वहीं गयी हो मधुशाला।।६४।

दो दिन ही मधु मुझे पिलाकर ऊब उठी साकीबाला,
भरकर अब खिसका देती है वह मेरे आगे प्याला,
नाज़, अदा, अंदाजों से अब, हाय पिलाना दूर हुआ,
अब तो कर देती है केवल फ़र्ज़ - अदाई मधुशाला।।६५।

छोटे-से जीवन में कितना प्यार करुँ, पी लूँ हाला,
आने के ही साथ जगत में कहलाया 'जानेवाला',
स्वागत के ही साथ विदा की होती देखी तैयारी,
बंद लगी होने खुलते ही मेरी जीवन-मधुशाला।।६६।

क्या पीना, निर्द्वन्द न जब तक ढाला प्यालों पर प्याला,
क्या जीना, निश्चिंत न जब तक साथ रहे साकीबाला,
खोने का भय, हाय, लगा है पाने के सुख के पीछे,
मिलने का आनंद न देती मिलकर के भी मधुशाला।।६७।

मुझे पिलाने को लाए हो इतनी थोड़ी-सी हाला!
मुझे दिखाने को लाए हो एक यही छिछला प्याला!
इतनी पी जीने से अच्छा सागर की ले प्यास मरुँ,
सिंधु-तृषा दी किसने रचकर बिंदु-बराबर मधुशाला।।६८।

क्या कहता है, रह न गई अब तेरे भाजन में हाला,
क्या कहता है, अब न चलेगी मादक प्यालों की माला,
थोड़ी पीकर प्यास बढ़ी तो शेष नहीं कुछ पीने को,
प्यास बुझाने को बुलवाकर प्यास बढ़ाती मधुशाला।।६९।

लिखी भाग्य में जितनी बस उतनी ही पाएगा हाला,
लिखा भाग्य में जैसा बस वैसा ही पाएगा प्याला,
लाख पटक तू हाथ पाँव, पर इससे कब कुछ होने का,
लिखी भाग्य में जो तेरे बस वही मिलेगी मधुशाला।।७०।

कर ले, कर ले कंजूसी तू मुझको देने में हाला,
दे ले, दे ले तू मुझको बस यह टूटा फूटा प्याला,
मैं तो सब्र इसी पर करता, तू पीछे पछताएगी,
जब न रहूँगा मैं, तब मेरी याद करेगी मधुशाला।।७१।

ध्यान मान का, अपमानों का छोड़ दिया जब पी हाला,
गौरव भूला, आया कर में जब से मिट्टी का प्याला,
साकी की अंदाज़ भरी झिड़की में क्या अपमान धरा,
दुनिया भर की ठोकर खाकर पाई मैंने मधुशाला।।७२।

क्षीण, क्षुद्र, क्षणभंगुर, दुर्बल मानव मिटटी का प्याला,
भरी हुई है जिसके अंदर कटु-मधु जीवन की हाला,
मृत्यु बनी है निर्दय साकी अपने शत-शत कर फैला,
काल प्रबल है पीनेवाला, संसृति है यह मधुशाला।।७३।

प्याले सा गढ़ हमें किसी ने भर दी जीवन की हाला,
नशा न भाया, ढाला हमने ले लेकर मधु का प्याला,
जब जीवन का दर्द उभरता उसे दबाते प्याले से,
जगती के पहले साकी से जूझ रही है मधुशाला।।७४।

अपने अंगूरों से तन में हमने भर ली है हाला,
क्या कहते हो, शेख, नरक में हमें तपाएगी ज्वाला,
तब तो मदिरा खूब खिंचेगी और पिएगा भी कोई,
हमें नमक की ज्वाला में भी दीख पड़ेगी मधुशाला।।७५।

यम आएगा लेने जब, तब खूब चलूँगा पी हाला,
पीड़ा, संकट, कष्ट नरक के क्या समझेगा मतवाला,
क्रूर, कठोर, कुटिल, कुविचारी, अन्यायी यमराजों के
डंडों की जब मार पड़ेगी, आड़ करेगी मधुशाला।।७६।

यदि इन अधरों से दो बातें प्रेम भरी करती हाला,
यदि इन खाली हाथों का जी पल भर बहलाता प्याला,
हानि बता, जग, तेरी क्या है, व्यर्थ मुझे बदनाम न कर,
मेरे टूटे दिल का है बस एक खिलौना मधुशाला।।७७।

याद न आए दुखमय जीवन इससे पी लेता हाला,
जग चिंताओं से रहने को मुक्त, उठा लेता प्याला,
शौक, साध के और स्वाद के हेतु पिया जग करता है,
पर मै वह रोगी हूँ जिसकी एक दवा है मधुशाला।।७८।

गिरती जाती है दिन प्रतिदन प्रणयनी प्राणों की हाला
भग्न हुआ जाता दिन प्रतिदन सुभगे मेरा तन प्याला,
रूठ रहा है मुझसे रूपसी, दिन दिन यौवन का साकी
सूख रही है दिन दिन सुन्दरी, मेरी जीवन मधुशाला।।७९।

यम आयेगा साकी बनकर साथ लिए काली हाला,
पी न होश में फिर आएगा सुरा-विसुध यह मतवाला,
यह अंतिम बेहोशी, अंतिम साकी, अंतिम प्याला है,
पथिक, प्यार से पीना इसको फिर न मिलेगी मधुशाला।८०।

ढलक रही है तन के घट से, संगिनी जब जीवन हाला
पत्र गरल का ले जब अंतिम साकी है आनेवाला,
हाथ स्पर्श भूले प्याले का, स्वाद सुरा जीव्हा भूले
कानो में तुम कहती रहना, मधु का प्याला मधुशाला।।८१।

मेरे अधरों पर हो अंतिम वस्तु न तुलसीदल प्याला
मेरी जीव्हा पर हो अंतिम वस्तु न गंगाजल हाला,
मेरे शव के पीछे चलने वालों याद इसे रखना
राम नाम है सत्य न कहना, कहना सच्ची मधुशाला।।८२।

मेरे शव पर वह रोये, हो जिसके आंसू में हाला
आह भरे वो, जो हो सुरिभत मदिरा पी कर मतवाला,
दे मुझको वो कान्धा जिनके पग मद डगमग होते हों
और जलूं उस ठौर जहां पर कभी रही हो मधुशाला।।८३।

और चिता पर जाये उंढेला पात्र न घ्रित का, पर प्याला
कंठ बंधे अंगूर लता में मध्य न जल हो, पर हाला,
प्राण प्रिये यदि श्राध करो तुम मेरा तो ऐसे करना
पीने वालों को बुलवा कऱ खुलवा देना मधुशाला।।८४।

नाम अगर कोई पूछे तो, कहना बस पीनेवाला
काम ढालना, और ढालना सबको मदिरा का प्याला,
जाति प्रिये, पूछे यदि कोई कह देना दीवानों की
धर्म बताना प्यालों की ले माला जपना मधुशाला।।८५।

ज्ञात हुआ यम आने को है ले अपनी काली हाला,
पंडित अपनी पोथी भूला, साधू भूल गया माला,
और पुजारी भूला पूजा, ज्ञान सभी ज्ञानी भूला,
किन्तु न भूला मरकर के भी पीनेवाला मधुशाला।।८६।

यम ले चलता है मुझको तो, चलने दे लेकर हाला,
चलने दे साकी को मेरे साथ लिए कर में प्याला,
स्वर्ग, नरक या जहाँ कहीं भी तेरा जी हो लेकर चल,
ठौर सभी हैं एक तरह के साथ रहे यदि मधुशाला।।८७।

पाप अगर पीना, समदोषी तो तीनों - साकी बाला,
नित्य पिलानेवाला प्याला, पी जानेवाली हाला,
साथ इन्हें भी ले चल मेरे न्याय यही बतलाता है,
कैद जहाँ मैं हूँ, की जाए कैद वहीं पर मधुशाला।।८८।

शांत सकी हो अब तक, साकी, पीकर किस उर की ज्वाला,
'और, और' की रटन लगाता जाता हर पीनेवाला,
कितनी इच्छाएँ हर जानेवाला छोड़ यहाँ जाता!
कितने अरमानों की बनकर कब्र खड़ी है मधुशाला।।८९।

जो हाला मैं चाह रहा था, वह न मिली मुझको हाला,
जो प्याला मैं माँग रहा था, वह न मिला मुझको प्याला,
जिस साकी के पीछे मैं था दीवाना, न मिला साकी,
जिसके पीछे था मैं पागल, हा न मिली वह मधुशाला!।९०।

देख रहा हूँ अपने आगे कब से माणिक-सी हाला,
देख रहा हूँ अपने आगे कब से कंचन का प्याला,
'बस अब पाया!'- कह-कह कब से दौड़ रहा इसके पीछे,
किंतु रही है दूर क्षितिज-सी मुझसे मेरी मधुशाला।।९१।

कभी निराशा का तम घिरता, छिप जाता मधु का प्याला,
छिप जाती मदिरा की आभा, छिप जाती साकीबाला,
कभी उजाला आशा करके प्याला फिर चमका जाती,
आँख मिचौली खेल रही है मुझसे मेरी मधुशाला।।९२।

'आ आगे' कहकर कर पीछे कर लेती साकीबाला,
होंठ लगाने को कहकर हर बार हटा लेती प्याला,
नहीं मुझे मालूम कहाँ तक यह मुझको ले जाएगी,
बढ़ा बढ़ाकर मुझको आगे, पीछे हटती मधुशाला।।९३।

हाथों में आने-आने में, हाय, फिसल जाता प्याला,
अधरों पर आने-आने में हाय, ढुलक जाती हाला,
दुनियावालो, आकर मेरी किस्मत की ख़ूबी देखो,
रह-रह जाती है बस मुझको मिलते-मिलते मधुशाला।।९४।

प्राप्य नही है तो, हो जाती लुप्त नहीं फिर क्यों हाला,
प्राप्य नही है तो, हो जाता लुप्त नहीं फिर क्यों प्याला,
दूर न इतनी हिम्मत हारुँ, पास न इतनी पा जाऊँ,
व्यर्थ मुझे दौड़ाती मरु में मृगजल बनकर मधुशाला।।९५।

मिले न, पर, ललचा ललचा क्यों आकुल करती है हाला,
मिले न, पर, तरसा तरसाकर क्यों तड़पाता है प्याला,
हाय, नियति की विषम लेखनी मस्तक पर यह खोद गई
'दूर रहेगी मधु की धारा, पास रहेगी मधुशाला!'।९६।

मदिरालय में कब से बैठा, पी न सका अब तक हाला,
यत्न सहित भरता हूँ, कोई किंतु उलट देता प्याला,
मानव-बल के आगे निर्बल भाग्य, सुना विद्यालय में,
'भाग्य प्रबल, मानव निर्बल' का पाठ पढ़ाती मधुशाला।।९७।

किस्मत में था खाली खप्पर, खोज रहा था मैं प्याला,
ढूँढ़ रहा था मैं मृगनयनी, किस्मत में थी मृगछाला,
किसने अपना भाग्य समझने में मुझसा धोखा खाया,
किस्मत में था अवघट मरघट, ढूँढ़ रहा था मधुशाला।।९८।

उस प्याले से प्यार मुझे जो दूर हथेली से प्याला,
उस हाला से चाव मुझे जो दूर अधर से है हाला,
प्यार नहीं पा जाने में है, पाने के अरमानों में!
पा जाता तब, हाय, न इतनी प्यारी लगती मधुशाला।।९९।

साकी के पास है तनिक सी श्री, सुख, संपित की हाला,
सब जग है पीने को आतुर ले ले किस्मत का प्याला,
रेल ठेल कुछ आगे बढ़ते, बहुतेरे दबकर मरते,
जीवन का संघर्ष नहीं है, भीड़ भरी है मधुशाला।।१००।

साकी, जब है पास तुम्हारे इतनी थोड़ी सी हाला,
क्यों पीने की अभिलषा से, करते सबको मतवाला,
हम पिस पिसकर मरते हैं, तुम छिप छिपकर मुसकाते हो,
हाय, हमारी पीड़ा से है क्रीड़ा करती मधुशाला।।१०१।

साकी, मर खपकर यदि कोई आगे कर पाया प्याला,
पी पाया केवल दो बूंदों से न अधिक तेरी हाला,
जीवन भर का, हाय, पिरश्रम लूट लिया दो बूंदों ने,
भोले मानव को ठगने के हेतु बनी है मधुशाला।।१०२।

जिसने मुझको प्यासा रक्खा बनी रहे वह भी हाला,
जिसने जीवन भर दौड़ाया बना रहे वह भी प्याला,
मतवालों की जिह्वा से हैं कभी निकलते शाप नहीं,
दुखी बनाया जिसने मुझको सुखी रहे वह मधुशाला!।१०३।

नहीं चाहता, आगे बढ़कर छीनूँ औरों की हाला,
नहीं चाहता, धक्के देकर, छीनूँ औरों का प्याला,
साकी, मेरी ओर न देखो मुझको तनिक मलाल नहीं,
इतना ही क्या कम आँखों से देख रहा हूँ मधुशाला।।१०४।

मद, मदिरा, मधु, हाला सुन-सुन कर ही जब हूँ मतवाला,
क्या गति होगी अधरों के जब नीचे आएगा प्याला,
साकी, मेरे पास न आना मैं पागल हो जाऊँगा,
प्यासा ही मैं मस्त, मुबारक हो तुमको ही मधुशाला।।१०५।

क्या मुझको आवश्यकता है साकी से माँगूँ हाला,
क्या मुझको आवश्यकता है साकी से चाहूँ प्याला,
पीकर मदिरा मस्त हुआ तो प्यार किया क्या मदिरा से!
मैं तो पागल हो उठता हूँ सुन लेता यदि मधुशाला।।१०६।

देने को जो मुझे कहा था दे न सकी मुझको हाला,
देने को जो मुझे कहा था दे न सका मुझको प्याला,
समझ मनुज की दुर्बलता मैं कहा नहीं कुछ भी करता,
किन्तु स्वयं ही देख मुझे अब शरमा जाती मधुशाला।।१०७।

एक समय संतुष्ट बहुत था पा मैं थोड़ी-सी हाला,
भोला-सा था मेरा साकी, छोटा-सा मेरा प्याला,
छोटे-से इस जग की मेरे स्वर्ग बलाएँ लेता था,
विस्तृत जग में, हाय, गई खो मेरी नन्ही मधुशाला!।१०८।

बहुतेरे मदिरालय देखे, बहुतेरी देखी हाला,
भाँति भाँति का आया मेरे हाथों में मधु का प्याला,
एक एक से बढ़कर, सुन्दर साकी ने सत्कार किया,
जँची न आँखों में, पर, कोई पहली जैसी मधुशाला।।१०९।

एक समय छलका करती थी मेरे अधरों पर हाला,
एक समय झूमा करता था मेरे हाथों पर प्याला,
एक समय पीनेवाले, साकी आलिंगन करते थे,
आज बनी हूँ निर्जन मरघट, एक समय थी मधुशाला।।११०।

जला हृदय की भट्टी खींची मैंने आँसू की हाला,
छलछल छलका करता इससे पल पल पलकों का प्याला,
आँखें आज बनी हैं साकी, गाल गुलाबी पी होते,
कहो न विरही मुझको, मैं हूँ चलती फिरती मधुशाला!।१११।

कितनी जल्दी रंग बदलती है अपना चंचल हाला,
कितनी जल्दी घिसने लगता हाथों में आकर प्याला,
कितनी जल्दी साकी का आकर्षण घटने लगता है,
प्रात नहीं थी वैसी, जैसी रात लगी थी मधुशाला।।११२।

बूँद बूँद के हेतु कभी तुझको तरसाएगी हाला,
कभी हाथ से छिन जाएगा तेरा यह मादक प्याला,
पीनेवाले, साकी की मीठी बातों में मत आना,
मेरे भी गुण यों ही गाती एक दिवस थी मधुशाला।।११३।

छोड़ा मैंने पथ मतों को तब कहलाया मतवाला,
चली सुरा मेरा पग धोने तोड़ा जब मैंने प्याला,
अब मानी मधुशाला मेरे पीछे पीछे फिरती है,
क्या कारण? अब छोड़ दिया है मैंने जाना मधुशाला।।११४।

यह न समझना, पिया हलाहल मैंने, जब न मिली हाला,
तब मैंने खप्पर अपनाया ले सकता था जब प्याला,
जले हृदय को और जलाना सूझा, मैंने मरघट को
अपनाया जब इन चरणों में लोट रही थी मधुशाला।।११५।

कितनी आई और गई पी इस मदिरालय में हाला,
टूट चुकी अब तक कितने ही मादक प्यालों की माला,
कितने साकी अपना अपना काम खतम कर दूर गए,
कितने पीनेवाले आए, किन्तु वही है मधुशाला।।११६।

कितने होठों को रक्खेगी याद भला मादक हाला,
कितने हाथों को रक्खेगा याद भला पागल प्याला,
कितनी शक्लों को रक्खेगा याद भला भोला साकी,
कितने पीनेवालों में है एक अकेली मधुशाला।।११७।

दर दर घूम रहा था जब मैं चिल्लाता - हाला! हाला!
मुझे न मिलता था मदिरालय, मुझे न मिलता था प्याला,
मिलन हुआ, पर नहीं मिलनसुख लिखा हुआ था किस्मत में,
मैं अब जमकर बैठ गया हूँ, घूम रही है मधुशाला।।११८।

मैं मदिरालय के अंदर हूँ, मेरे हाथों में प्याला,
प्याले में मदिरालय बिंबित करनेवाली है हाला,
इस उधेड़-बुन में ही मेरा सारा जीवन बीत गया -
मैं मधुशाला के अंदर या मेरे अंदर मधुशाला!।११९।

किसे नहीं पीने से नाता, किसे नहीं भाता प्याला,
इस जगती के मदिरालय में तरह-तरह की है हाला,
अपनी-अपनी इच्छा के अनुसार सभी पी मदमाते,
एक सभी का मादक साकी, एक सभी की मधुशाला।।१२०।

वह हाला, कर शांत सके जो मेरे अंतर की ज्वाला,
जिसमें मैं बिंबित-प्रतिबिंबित प्रतिपल, वह मेरा प्याला,
मधुशाला वह नहीं जहाँ पर मदिरा बेची जाती है,
भेंट जहाँ मस्ती की मिलती मेरी तो वह मधुशाला।।१२१।

मतवालापन हाला से ले मैंने तज दी है हाला,
पागलपन लेकर प्याले से, मैंने त्याग दिया प्याला,
साकी से मिल, साकी में मिल अपनापन मैं भूल गया,
मिल मधुशाला की मधुता में भूल गया मैं मधुशाला।।१२२।

मदिरालय के द्वार ठोंकता किस्मत का छूंछा प्याला,
गहरी, ठंडी सांसें भर भर कहता था हर मतवाला,
कितनी थोड़ी सी यौवन की हाला, हा, मैं पी पाया!
बंद हो गई कितनी जल्दी मेरी जीवन मधुशाला।।१२३।

कहाँ गया वह स्वर्गिक साकी, कहाँ गयी सुरिभत हाला,
कहाँ गया स्वपिनल मदिरालय, कहाँ गया स्वर्णिम प्याला!
पीनेवालों ने मदिरा का मूल्य, हाय, कब पहचाना?
फूट चुका जब मधु का प्याला, टूट चुकी जब मधुशाला।।१२४।

अपने युग में सबको अनुपम ज्ञात हुई अपनी हाला,
अपने युग में सबको अदभुत ज्ञात हुआ अपना प्याला,
फिर भी वृद्धों से जब पूछा एक यही उत्तर पाया -
अब न रहे वे पीनेवाले, अब न रही वह मधुशाला!।१२५।

'मय' को करके शुद्ध दिया अब नाम गया उसको, 'हाला'
'मीना' को 'मधुपात्र' दिया 'सागर' को नाम गया 'प्याला',
क्यों न मौलवी चौंकें, बिचकें तिलक-त्रिपुंडी पंडित जी
'मय-महिफल' अब अपना ली है मैंने करके 'मधुशाला'।।१२६।

कितने मर्म जता जाती है बार-बार आकर हाला,
कितने भेद बता जाता है बार-बार आकर प्याला,
कितने अर्थों को संकेतों से बतला जाता साकी,
फिर भी पीनेवालों को है एक पहेली मधुशाला।।१२७।

जितनी दिल की गहराई हो उतना गहरा है प्याला,
जितनी मन की मादकता हो उतनी मादक है हाला,
जितनी उर की भावुकता हो उतना सुन्दर साकी है,
जितना ही जो रिसक, उसे है उतनी रसमय मधुशाला।।१२८।

जिन अधरों को छुए, बना दे मस्त उन्हें मेरी हाला,
जिस कर को छू दे, कर दे विक्षिप्त उसे मेरा प्याला,
आँख चार हों जिसकी मेरे साकी से दीवाना हो,
पागल बनकर नाचे वह जो आए मेरी मधुशाला।।१२९।

हर जिव्हा पर देखी जाएगी मेरी मादक हाला
हर कर में देखा जाएगा मेरे साकी का प्याला
हर घर में चर्चा अब होगी मेरे मधुविक्रेता की
हर आंगन में गमक उठेगी मेरी सुरिभत मधुशाला।।१३०।

मेरी हाला में सबने पाई अपनी-अपनी हाला,
मेरे प्याले में सबने पाया अपना-अपना प्याला,
मेरे साकी में सबने अपना प्यारा साकी देखा,
जिसकी जैसी रुचि थी उसने वैसी देखी मधुशाला।।१३१।

यह मदिरालय के आँसू हैं, नहीं-नहीं मादक हाला,
यह मदिरालय की आँखें हैं, नहीं-नहीं मधु का प्याला,
किसी समय की सुखदस्मृति है साकी बनकर नाच रही,
नहीं-नहीं कवि का हृदयांगण, यह विरहाकुल मधुशाला।।१३२।

कुचल हसरतें कितनी अपनी, हाय, बना पाया हाला,
कितने अरमानों को करके ख़ाक बना पाया प्याला!
पी पीनेवाले चल देंगे, हाय, न कोई जानेगा,
कितने मन के महल ढहे तब खड़ी हुई यह मधुशाला!।१३३।

विश्व तुम्हारे विषमय जीवन में ला पाएगी हाला
यदि थोड़ी-सी भी यह मेरी मदमाती साकीबाला,
शून्य तुम्हारी घड़ियाँ कुछ भी यदि यह गुंजित कर पाई,
जन्म सफल समझेगी जग में अपना मेरी मधुशाला।।१३४।

बड़े-बड़े नाज़ों से मैंने पाली है साकीबाला,
कलित कल्पना का ही इसने सदा उठाया है प्याला,
मान-दुलारों से ही रखना इस मेरी सुकुमारी को,
विश्व, तुम्हारे हाथों में अब सौंप रहा हूँ मधुशाला।।१३५।

पिरिशष्ट से

स्वयं नहीं पीता, औरों को, किन्तु पिला देता हाला,
स्वयं नहीं छूता, औरों को, पर पकड़ा देता प्याला,
पर उपदेश कुशल बहुतेरों से मैंने यह सीखा है,
स्वयं नहीं जाता, औरों को पहुंचा देता मधुशाला।

मैं कायस्थ कुलोदभव मेरे पुरखों ने इतना ढ़ाला,
मेरे तन के लोहू में है पचहत्तर प्रतिशत हाला,
पुश्तैनी अधिकार मुझे है मदिरालय के आँगन पर,
मेरे दादों परदादों के हाथ बिकी थी मधुशाला।

बहुतों के सिर चार दिनों तक चढ़कर उतर गई हाला,
बहुतों के हाथों में दो दिन छलक झलक रीता प्याला,
पर बढ़ती तासीर सुरा की साथ समय के, इससे ही
और पुरानी होकर मेरी और नशीली मधुशाला।

पितृ पक्ष में पुत्र उठाना अर्ध्य न कर में, पर प्याला
बैठ कहीं पर जाना, गंगा सागर में भरकर हाला
किसी जगह की मिटटी भीगे, तृप्ति मुझे मिल जाएगी
तर्पण अर्पण करना मुझको, पढ़ पढ़ कर के मधुशाला।
- हरिवंशराय बच्चन

सोमवार, 12 अगस्त 2019

विद्या भारती का लक्ष्य- भारत माता का पुनर्वैभव.


       विद्या भारती का पूरा नाम “विद्या भारती अखिल भारतीय शिक्षा संस्थान” है। यह शिक्षा के क्षेत्र में सबसे बड़ी अशासकीय संस्था है। इसके अन्तर्गत भारत में लगभग १८,००० शैक्षिक संस्थान कार्य कर रहे हैं। इसकी स्थापना सन् १९७७ में हुई थी। विद्या भारती, शिक्षा के सभी स्तरों – प्राथमिक, माध्यमिक एवं उच्च पर कार्य कर रही है। इसके अलावा यह शिक्षा के क्षेत्र में अनुसंधान करती है। इसका अपना ही प्रकाशन विभाग है जो बहुमूल्य पुस्तकें, पत्रिकाएँ एवं शोध-पत्र प्रकाशित करता है। शिक्षा के क्षेत्र का सबसे बड़ा गैर सरकारी संगठन है। विद्या भारती संघ परिवार का एक अंग है। विद्या भारती के तहत, ३०००० शिक्षण संस्थान संचालित होते है। विद्या भारती शिशुवाटिका, प्राथमिक, उच्च प्राथमिक, माध्यमिक, वरिष्ठ माध्यमिक, संस्कार केंद्र, एकल विद्यालय, पूर्ण एवं अर्द्ध आवासीय विद्यालय और महाविद्यालयों के छात्रों के लिए शिक्षा प्रदान करता है।
आज लगभग सम्पूर्ण भारत में 86 प्रांतीय एवं क्षेत्रीय समितियाँ विद्या भारती से संलग्न हैं। इनके अंतर्गत कुल मिलाकर 23320 शिक्षण संस्थाओं में 1,47,634 शिक्षकों के मार्गदर्शन में 34 लाख छात्र-छात्राएं शिक्षा एवं संस्कार ग्रहण कर रहे हैं। इनमें से 49 शिक्षक प्रशिक्षक संस्थान एवं महाविद्यालय, 2353 माध्यमिक एवं 923 उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, 633 पूर्व प्राथमिक एवं 5312 प्राथमिक, 4164 उच्च प्राथमिक एवं 6127 एकल शिक्षक विद्यालय तथा 3679 संस्कार केंद्र हैं। आज नगरों और ग्रामों में, वनवासी और पर्वतीय क्षेत्रों में झुग्गी-झोंपड़ियों में, शिशु वाटिकाएं, शिशु मंदिर, विद्या मंदिर, सरस्वती विद्यालय, उच्चतर शिक्षा संस्थान, शिक्षक प्रशिक्षण केंद्र और शोध संस्थान हैं। इन सरस्वती मंदिरों की संख्या निरंतर बढ़ रही है और आज विद्या भारती भारत में सबसे बड़ा गैर सरकारी शिक्षा संगठन बन चुका है।
       1952 में संघ प्रेरणा से कुछ निष्ठावान लोग शिक्षा के पुनीत कार्य में जुटे। राष्ट्र निर्माण के इस कार्य में लगे लोगों ने नवोदित पीढ़ी को सुयोग्य शिक्षा और शिक्षा के साथ संस्कार देने के लिए “सरस्वती शिशु मंदिर” की आधारशिला गोरखपुर में पांच रुपये मासिक किराये के भवन में पक्की बाग़ में रखकर प्रथम शिशु मंदिर की स्थापना से श्रीगणेश किया। इससे पूर्व कुरुक्षेत्र में गीता विद्यालय की स्थापना 1946 में हो चुकी थी।
उत्तर प्रदेश में शिशु मंदिरों के संख्या तीव्र गति से बढ़ने लगी। इनके मार्गदर्शन एवं समुचित विकास के लिए 1958 में ‘शिशु शिक्षा प्रबंध समिति’ नाम से प्रदेश समिति का गठन किया गया। सरस्वती शिशु मंदिरों को सुशिक्षा एवं सद्संस्कारों के केन्द्रों के रूप में समाज में प्रतिष्ठा एवं लोकप्रियता प्राप्त होने लगी। अन्य प्रदेशों में भी जब विद्यालयों की संख्या बढ़ने लगी तो उन प्रदेशों में भी प्रदेश समितियों का गठन हुआ। पंजाब एवं चंडीगढ़ में सर्वहितकारी शिक्षा समिति, हरियाणा में हिन्दू शिक्षा समिति बनी। इसी प्रयत्न ने 1977 में अखिल भारतीय स्वरुप लिया और विद्या भारती संस्था का प्रादुर्भाव दिल्ली में हुआ। इसके बाद सभी प्रदेश समितियां विद्या भारती से सम्बद्ध हो गईं।
 दर्शन, लक्ष्य और उद्देश्य :
शैक्षिक चिंतन का अधिष्ठान — हिन्दू जीवन दर्शन
1. भारतीय शिक्षा दर्शन का विकास
         विद्या भारती एवं राष्ट्र भक्त शिक्षा शास्त्रियों का यह स्पष्ट मत है कि शिक्षा तभी व्यक्ति एवं राष्ट्र के जीवन के लिए उपयोगी होगी जब वह भारत के राष्ट्रीय जीवन दर्शन पर अधिष्ठित होगी जो मूलतः हिन्दू जीवन दर्शन है. अतः विद्या भारती ने हिन्दू जीवन दर्शन के अधिष्ठान पर भारतीय शिक्षा दर्शन का विकास किया है. इसी के आधार पर शिक्षा के उददेश्य एवं बालक के विकास के संकल्पना निर्धारित की है.
2. शिक्षण पद्धति का आधार – भारतीय मनोविज्ञान
         शिक्षा पद्धति का निर्धारण मनोविज्ञान के द्वारा होता है. प्रचलित शिक्षण पद्धति का आधार पश्चीमी देशों में विकसित मनोविज्ञान है जो विशुद्ध भौतिकवादी दृष्टिकोण पर आधारित है. हिन्दू जीवन दर्शन पर आधारित भारतीय शिक्षा दर्शन के अनुसार बालक के सर्वांगीण विकास की अवधारणा विशुद्ध आध्यात्मिक है. परिपूर्ण मानव के विकास के संकल्पना पश्चिमी मनोविज्ञान पर आधारित शिक्षण पद्धति के द्वारा पूर्ण होना कदापि संभव नहीं है. अतः विद्या भारती ने भारतीय मनोविज्ञान का विकास किया है और उसी पर अपनी शिक्षण पद्धति को आधारित किया है तथा उसका नामकरण “सरस्वती पंचपदीय शिक्षण विधि” किया है.
उसके पांच पद हैं :-
1.  अधीति
2.  बोध
3.  अभ्यास
4.  प्रसार-स्वाध्याय एवं प्रवचन. प्राथमिक स्तर पर “सरस्वती शिशु मंदिर शिक्षण पद्धति”
5. पूर्व प्राथमिक स्तर पर “शिशु वाटिका शिक्षण पद्धति” के नाम से इसे शिक्षा जगत में प्रतिष्ठा प्राप्त हुई.
 संगठन :
        बालक ही हमारी आशाओं का केंद्र है. वही हमारे देश, धर्म एवं संस्कृति का रक्षक है. उसके व्यक्तित्व के विकास में हमारी संस्कृति एवं सभ्यता का विकास निहित है. आज का बालक ही कल का कर्णधार है. बालक का नाता भूमि एवं पूर्वजों से जोड़ना, यह शिक्षा का सीधा, सरल तथा सुस्पस्ट लक्ष्य है. शिक्षा और संस्कार द्वारा हमें बालक का सर्वांगीण विकास करना है.
प्रथम सरस्वती शिशु मंदिर –
          बस यही स्वप्न लेकर इस शिक्षा क्षेत्र को जीवन साधना समझकर 1952 में, संघ प्रेरणा से कुछ निष्ठावान लोग इस पुनीत कार्य में जुट गए. राष्ट्र निर्माण के इस कार्य में लगे लोगों ने नवोदित पीढ़ी को सुयोग्य शिक्षा और शिक्षा के साथ संस्कार देने के लिए “सरस्वती शिशु मंदिर” की आधारशिला गोरखपुर में पांच रुपये मासिक किराये के भवन में पक्की बाग़ में रखकर प्रथम शिशु मंदिर की स्थापना से श्रीगणेश किया. इससे पूर्व कुरुक्षेत्र में गीता विद्यालय की स्थापना 1946 में हो चुकी थी. मन की आस्था, ह्रदय का विकास, निश्चय की अडिगता तथा कल्पित स्वप्न को मन में लेकर कार्यकर्ताओं के द्वारा अपने विद्यालयों का नाम, विचार कर “सरस्वती शिशु मंदिर” रखा गया. उन्हीं की साधना, तपस्या, परिश्रम व संबल के परिणामस्वरुप स्थान-स्थान पर “सरस्वती शिशु मंदिर” स्थापित होने लगे.
        उत्तर प्रदेश में शिशु मंदिरों के संख्या तीव्र गति से बढ़ने लगी. इनके मार्गदर्शन एवं समुचित विकास के लिए 1958 में शिशु शिक्षा प्रबंध समिति नाम से प्रदेश समिति का गठन किया गया. सरस्वती शिशु मंदिरों को सुशिक्षा एवं सद्संस्कारों के केन्द्रों के रूप में समाज में प्रतिष्ठा एवं लोकप्रियता प्राप्त होने लगी. अन्य प्रदेशों में भी जब विद्यालयों की संख्या बढ़ने लगी तो उन प्रदेशों में भी प्रदेश समितियों का गठन हुआ. पंजाब एवं चंडीगढ़ में सर्वहितकारी शिक्षा समिति, हरियाणा में हिन्दू शिक्षा समिति बनी. इसी प्रयत्न ने 1977 में अखिल भारतीय स्वरुप लिया और विद्या भारती संस्था का प्रादुर्भाव दिल्ली में हुआ. सभी प्रदेश समितियां विद्या भारती से सम्बद्ध हो गईं.
 विद्या भारती के प्रकाशन :
१. “विद्या भारती प्रदीपिका” त्रैमासिक पत्रिका, दिल्ली से प्रकाशित होती है.
२. “देवपुत्र” मासिक पत्रिका बाल-किशोर छात्रों के लिए इंदौर से प्रकाशित होती है.
३. “भारतीय शिक्षा शोध पत्रिका” लखनऊ से प्रकाशित होती है.
इसके अतिरिक्त अन्य साहित्यिक एवं संस्कृति ज्ञान परीक्षा सम्बन्धी पुस्तकें कुरुक्षेत्र से प्रकाशित होती हैं. |
 विद्या भारती के अंतर्गत विद्यालयों में शारीरिक शिक्षा ,योग शिक्षा,नैतिक एवं आध्यात्मिक शिक्षा,संस्कृत भाषा,संगीत शिक्षण आदि का समावेश होता है |  
 आवासीय विद्यालय :
         विद्या भारती से सम्बद्ध आवासीय विद्यालय इस समय देशभर में चल रहे हैं. लगभग हर प्रान्त में एक आदर्श आवासीय विद्यालय की स्थापना हो चुकी है. इन आवासीय विद्यालयों में बालक चौबीस घंटे रहता है. प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में जागरण से रात्रि दस बजे तक आदर्श दिनचर्या का पालन करते हुए वे शिक्षण और सद्संस्कारों के वातावरण में विकास करते हैं. ज्ञान-विज्ञान के क्षेत्र में उच्च स्तर तो प्राप्त करते ही हैं, साथ ही भारतीय संस्कृति, धर्म एवं राष्ट्र भक्ति आदि जीवन मूल्यों से उनका जीवन पुष्पित एवं पल्लवित होकर सद्गुणों से सुगन्धित होता रहता है. दिनभर में इस समय 66 आवासीय विद्यालय हैं.
 भारतीय शिक्षा शोध संस्थान :
        आचार्यों के द्वारा शिक्षण में नए-नए प्रयोग एवं शोध (रिसर्च) करने के लिए, जबलपुर, उज्जैन, जयपुर, चंडीगढ़, मेरठ और वाराणसी में शोध केंद्र खोले गए हैं. भारतीय शिक्षा शोध संस्थान, लखनऊ में स्थित है. जहाँ से “भारतीय शिक्षा शोध पत्रिका” का प्रकाशन नियमित रूप से होता है. यह पत्रिका विशेष रूप से आचार्यों के लिए प्रेरणादायक एवं लाभप्रद है. शोध कार्य का मुख्य क्षेत्र शिक्षण पद्धति, भारतीय शिक्षा मनोविज्ञान, अभिवृत्तियों का मापन, परीक्षण एवं उपलब्धियों का मूल्यांकन आदि करना है.

साभार- www.vskgujarat.com

बुधवार, 7 अगस्त 2019

सरस्वती विद्या मंदिर इंटर कॉलेज नई टिहरी की अभिभावकों से अपील.

Rekha Dobhal, TGT Science.
 अभिभावकों से अपील

  •  बच्चों को मोबाइल फोन का उपयोग न करने दें, आवश्यक होने पर अपनी देखरेख में ही मोबाइल का उपयोग करने दिया जाए. बच्चों को साइबर अपराधों के प्रति भी जागरूक बनायें.
  •  शाम 8:00 बजे तक टीवी बंद कर दें। टीवी पर आठ बजे के बाद आपके बच्चे से ज्यादा महत्वपूर्ण कुछ नहीं होता है। बच्चों के लिए समय देना बहुत जरूरी है.
  • अपने बच्चे की स्कूल डायरी और गृह कार्य देखने के लिए 30-45 मिनट निकालिए। उसके गृहकार्य पूरे कराइए। साथ ही समय समय पर स्कूल बैग और किताब-कापियों को देखना न भूलें. 
  • रोज सभी विषयों में उनका प्रदर्शन देखिए। उन विषयों का खास ध्यान रखिए जिसमें वह कमजोर है / अच्छा कार्य नहीं कर रहा है। 
  • उनकी बुनियादी शिक्षा भविष्य के लिए बहुत महत्वपूर्ण है. इसलिए बच्चे को भविष्य के लिए लक्ष्य निर्धारित करने के लिए प्रेरित करें.
  •  उन्हें सुबह जल्दी उठने की आदत डालिए 5:30 बजे तक बच्चों को उठाकर नित्यक्रम के बाद कुछ देर योग, मेडिटेशन व ध्यान लगाने के लिए प्रेरित करें। 
  • सोने के समय अपने बच्चों को पंचतंत्र, अकबर-बीरबल, तेनाली राम आदि की कहानी, किस्से और प्रेरक प्रसंग अवश्य सुनाइए। 
  •   हर साल गर्मी की छुट्टी में (अपने बजट के अनुसार) कहीं घूमने जाइए। इससे वे अलग लोगों के साथ और अलग जगहों पर रहना सीखते हैं। 
  •  अपने बच्चे की प्रतिभा का पता लगाइए और उसे इसे निखारने में सहायता कीजिए. वह किसी विषय, संगीत, खेल, अभिनय, चित्रांकन, नृत्य आदि में दिलचस्पी रख सकता है। इससे उसका जीवन आनंददायक हो जाएगा। 
  • उसे सीखाइए कि प्रदूषण फ़ैलाने वाली चीजों व प्लास्टिक का उपयोग नहीं करना चाहिए हर इतवार कोशिश कीजिए कि खाने की कोई ऐसी चीज बनाएं जो उन्हें पसंद है। उन्हें इसमें अपनी मदद करने के लिए कहिए।
  • प्रत्येक बच्चे जन्म से वैज्ञानिक होते हैं उनके पास ढेरों सवाल होते हैं. मुमकिन है हम जवाब न दें पायें, पर जानकारी न होने के कारण हमें सवाल पर गुस्सा नहीं दिखाना चाहिए। उत्तर पता करने की कोशिश कीजिए औऱ उन्हें बताइए.
  •  उन्हें अनुशासन और जीने के बेहतर तरीकों के बारे में बताइए। सही गलत के बारे में समझाइए.
  •  बच्चे को अपने काम में सहायता करने के लिए कहिए। इसमें खाना बनाना, स्वच्छता व सफाई, चीजों को व्यवस्थित करना आदि शामिल है.
  •   बच्चों को नशीली बस्तुओं के सेवन से होने वाले बुरे परिणामों की जानकारी दें. अच्छी शिक्षा के साथ बच्चों को नशे की प्रवृति से बचाना अभिभावकों और शिक्षकों सहित आमलोगों का दायित्व होना चाहिए.
  • और सबसे महत्त्वपूर्ण कि हमें अपने बच्चों को शिक्षा के साथ अच्छे संस्कार भी देने चाहिए ताकि वो जीवन में सफल और सही इन्सान बन सके।याद रखे की अच्छी शिक्षा प्राप्त करने वाले अनेक लोग उच्च पदों पर तो आसीन हो जाते हैं किन्तु अच्छे संस्कारों के अभाव में भ्रष्टाचार और अनैतिक कृत्यों में लिप्त हो जाते हैं. इसलिए अच्छी शिक्षा के साथ अच्छे संस्कार बहुत जरूरी हैं.
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महान व्यक्तित्व- स्वामी विवेकानंद जी.

    
स्वामी विवेकानंद
   स्वामी विवेकानंद का जन्म 12 जनवरी सन्‌ 1863 को हुआ। उनका घर का नाम नरेंद्र दत्त था। उनके पिता श्री विश्वनाथ दत्त पाश्चात्य सभ्यता में विश्वास रखते थे। वे अपने पुत्र नरेंद्र को भी अंगरेजी पढ़ाकर पाश्चात्य सभ्यता के ढंग पर ही चलाना चाहते थे। नरेंद्र की बुद्धि बचपन से बड़ी तीव्र थी और परमात्मा को पाने की लालसा भी प्रबल थी। इस हेतु वे पहले ब्रह्म समाज में गए किंतु वहाँ उनके चित्त को संतोष नहीं हुआ। सन्‌ 1884 में श्री विश्वनाथ दत्त की मृत्यु हो गई। घर का भार नरेंद्र पर पड़ा। घर की दशा बहुत खराब थी। कुशल यही थी कि नरेंद्र का विवाह नहीं हुआ था। अत्यंत गरीबी में भी नरेंद्र बड़े अतिथि-सेवी थे। स्वयं भूखे रहकर अतिथि को भोजन कराते, स्वयं बाहर वर्षा में रातभर भीगते-ठिठुरते पड़े रहते और अतिथि को अपने बिस्तर पर सुला देते।
       रामकृष्ण परमहंस की प्रशंसा सुनकर नरेंद्र उनके पास पहले तो तर्क करने के विचार से ही गए थे किंतु परमहंसजी ने देखते ही पहचान लिया कि ये तो वही शिष्य है जिसका उन्हें कई दिनों से इंतजार है। परमहंसजी की कृपा से इनको आत्म-साक्षात्कार हुआ फलस्वरूप नरेंद्र परमहंसजी के शिष्यों में प्रमुख हो गए। संन्यास लेने के बाद इनका नाम विवेकानंद हुआ। स्वामी विवेकानन्द अपना जीवन अपने गुरुदेव स्वामी रामकृष्ण परमहंस को समर्पित कर चुके थे। गुरुदेव के शरीर-त्याग के दिनों में अपने घर और कुटुम्ब की नाजुक हालत की परवाह किए बिना, स्वयं के भोजन की परवाह किए बिना गुरु सेवा में सतत हाजिर रहे। गुरुदेव का शरीर अत्यंत रुग्ण हो गया था। कैंसर के कारण गले में से थूंक, रक्त, कफ आदि निकलता था। इन सबकी सफाई वे खूब ध्यान से करते थे।
       एक बार किसी ने गुरुदेव की सेवा में घृणा और लापरवाही दिखाई तथा घृणा से नाक भौंहें सिकोड़ीं। यह देखकर विवेकानन्द को गुस्सा आ गया। उस गुरुभाई को पाठ पढ़ाते हुए और गुरुदेव की प्रत्येक वस्तु के प्रति प्रेम दर्शाते हुए उनके बिस्तर के पास रक्त, कफ आदि से भरी थूकदानी उठाकर पूरी पी गए।गुरु के प्रति ऐसी अनन्य भक्ति और निष्ठा के प्रताप से ही वे अपने गुरु के शरीर और उनके दिव्यतम आदर्शों की उत्तम सेवा कर सके। गुरुदेव को वे समझ सके, स्वयं के अस्तित्व को गुरुदेव के स्वरूप में विलीन कर सके। समग्र विश्व में भारत के अमूल्य आध्यात्मिक खजाने की महक फैला सके। उनके इस महान व्यक्तित्व की नींव में थी ऐसी गुरुभक्ति, गुरुसेवा और गुरु के प्रति अनन्य निष्ठा।
         25 वर्ष की अवस्था में नरेंद्र दत्त ने गेरुआ वस्त्र पहन लिए। तत्पश्चात उन्होंने पैदल ही पूरे भारतवर्ष की यात्रा की। सन्‌ 1893 में शिकागो (अमेरिका) में विश्व धर्म परिषद् हो रही थी। स्वामी विवेकानंदजी उसमें भारत के प्रतिनिधि के रूप से पहुंचे। योरप-अमेरिका के लोग उस समय पराधीन भारतवासियों को बहुत हीन दृष्टि से देखते थे। वहां लोगों ने बहुत प्रयत्न किया कि स्वामी विवेकानंद को सर्वधर्म परिषद् में बोलने का समय ही न मिले। एक अमेरिकन प्रोफेसर के प्रयास से उन्हें थोड़ा समय मिला किंतु उनके विचार सुनकर सभी विद्वान चकित हो गए। फिर तो अमेरिका में उनका बहुत स्वागत हुआ। वहां इनके भक्तों का एक बड़ा समुदाय हो गया। तीन वर्ष तक वे अमेरिका रहे और वहाँ के लोगों को भारतीय तत्वज्ञान की अद्भुत ज्योति प्रदान करते रहे।
         अध्यात्म-विद्या और भारतीय दर्शन के बिना विश्व अनाथ हो जाएगा' यह स्वामी विवेकानंदजी का दृढ़ विश्वास था। अमेरिका में उन्होंने रामकृष्ण मिशन की अनेक शाखाएं स्थापित कीं। अनेक अमेरिकन विद्वानों ने उनका शिष्यत्व ग्रहण किया। 4 जुलाई सन्‌ 1902 को उन्होंने देह त्याग किया। वे सदा अपने को गरीबों का सेवक कहते थे। भारत के गौरव को देश-देशांतरों में उज्ज्वल करने का उन्होंने सदा प्रयत्न किया।
 
  •   स्वामी विवेकानंद कहते हैं कि जिस पल मुझे यह ज्ञात हो गया कि हर मानव के हृदय में भगवान है। तभी से मैं अपने सामने आने वाले हर व्यक्ति में ईश्वर की छवि देखने लगा हूं और उसी पल मैं हर बंधन से छूट गया। हर उस चीज से जो बंद रखती हैं.., धूमिल हो जाती है और मैं तो आजाद हूं।  


  • बाहर की दुनिया बिलकुल वैसी हैं, जैसा कि हम अंदर से सोचते हैं। हमारे विचार ही चीजों को सुंदर और बदसूरत बनाते हैं। पूरा संसार हमारे अंदर समाया हुआ हैं, बस जरूरत हैं चीजों को सही रोशनी में रखकर देखने की।                                                                       साभार- https://hindi.webdunia.com
               

श्वसन की परिभाषा क्या है , इसके प्रकार , उदाहरण और मनुष्य के श्वसन तंत्र को जाने।


Rekha Dobhal
      श्वसन : वे सभी क्रियाएँ जो ऑक्सीकरण द्वारा खाद्य पदार्थों से रासायनिक ऊर्जा मुक्त करने से सम्बन्धित होती है , श्वसन कहलाती है। स्वशन दो प्रकार का होता है – बाह्य श्वसन : वातावरण से ऑक्सीजन ग्रहण करने तथा CO2 बाहर निकालने की क्रिया को बाह्य श्वसन कहते है | आन्तरिक श्वसन : ऑक्सीजन के उपयोग तथा ATP व CO2 उत्पादन से सम्बन्धित प्रक्रियाएँ आंतरिक या कोशिकीय श्वसन कहलाता है | प्राणियों में गैसों का आदान प्रदान हेतु निम्न संरचनाएं पायी जाती है –
शरीर की सामान्य सतह द्वारा : जलीय व अर्द्धजलीय वातावरण में रहने वाले जीवों में गैसों का आदान प्रदान सामान्य सतह द्वारा होता है , इन प्राणियों में श्वसन अंगो का अभाव होता है | उदाहरण – अमीबा , स्पंज , मेंढक इत्यादि |
क्लोम (gills) के द्वारा : ये गैस विनिमय के विशिष्ट अंग होते है , क्लोम के द्वारा प्राणियों में जलीय श्वसन होता है , ऑक्सीजन क्लोम द्वारा ग्रहण की जाती है तथा co2 बाहर निकाली जाती है | मछलियों में क्लोम गिल दरारों में पाये जाते है | उदाहरण – मछलियाँ , मोलस्का व कुछ आर्थोपोड़ा के सदस्य |
ट्रेकिया या श्वासनली द्वारा : कीटो व कुछ मछलियों में गैस विनिमय के लिए पतली , शाखित , उत्तकों तक फैली नलिकाएं पायी जाती है जिन्हें ट्रेकिया कहते है | ये ट्रेकिया तंत्र का निर्माण करती है , ये o2 व co2 को उत्तकों तक पहुंचाने व निकालने का कार्य करती है | उदाहरण –कीट

फेफड़े (lungs) : सभी कशेरुकीयों में श्वसन हेतु फेफड़े पाये जाते है | फेफडो द्वारा o2 व co2 के आदान प्रदान में हीमोग्लोबिन , श्वसन वर्णक सहायक होता है |
मनुष्य में श्वसन तंत्र
नासाद्वार : ये एक जोड़ी होते है , नासाद्वार में रोम व श्लेष्मिका झिल्ली पायी जाती है | नासाद्वार से वायु प्रवेश करती है |
नासागुहा : नासागुहा में वायु गर्म व नम हो जाती है तथा धूल के कम व अन्य सूक्ष्म कणों को श्लेष्मिका झिल्ली में तथा रोमों द्वारा रोक लिया जाता है अर्थात वायु छनती है |
नासाग्रसनी : नासागुहा आगे की ओर नासा ग्रसनी में खुलती है , नासा ग्रसनी में त्रिभुजाकार संरचना होती है जिसे कंठ कहते है | कन्ठ में स्तर रज्जू पाये जाते है जो स्तर उत्पन्न करते है |
श्वासनली : यह लगभग 12 cm लम्बी नली होती है जो आगे की ओर दो श्वसनियों में बंट जाती है | श्वासनली व श्वसनियों में सी (C) आकार की उपास्थियाँ पायी जाती है | जो सहारा प्रदान करती है , श्वासनली में श्लेष्मा एवं पक्ष्माभी कोशिकाएँ पायी जाती है |श्लेष्मा में जीवाणुओं व सूक्ष्म कणों को रोक लिया जाता है , श्वसनियाँ आगे श्वसनिकाओं में बंट जाती है |
फेफडे : मनुष्य की वक्ष गुहा में , ह्रदय के पास दो फेफड़े होते है , दायाँ फेफड़ा तीन व बायाँ फेफड़ा दो पालियों में विभक्त होता है | फेफडो के चारो ओर दो फुफ्फुस आवरण पाये जाते है , प्रत्येक फेफडे में एक श्वसनी प्रवेश करती है | जो उतरोत्तर विभाजित होकर श्वसनीकाएं बनाती है | श्वसनीकाएं उप-विभाजित होकर वायु कुपिका कोष बनाती है | दोनों फेफडो में लगभग 60 करोड़ वायुकुपिकाएं पायी जाती है | वायु-कूपिका श्वसन तंत्र की सबसे छोटी संरचनात्मक एवं क्रियात्मक इकाई होती है जिनका व्यास 0.2mm होता है | वायु कूपिका की भित्ति अत्यंत पतली होती है , वायु कुपिकाओं के चारो ओर रुधिर केशिकाओं का सघन जाल होता है वायुकूपिका व रुधिर केशिकाओ के मध्य गैसों का आदान प्रदान होता है |

ऑक्सीजन हमारे चारों ओर हवा में है। यह त्वचा को घुमा सकता है, लेकिन केवल छोटी मात्रा में, जीवन को बनाए रखने के लिए पूरी तरह अपर्याप्त है। ऑक्सीजन का सेवन और कार्बन डाइऑक्साइड को हटाने से श्वसन तंत्र द्वारा प्रदान किया जाता है। शरीर के लिए जरूरी गैसों और अन्य पदार्थों का परिवहन परिसंचरण तंत्र का उपयोग करके किया जाता है। श्वसन प्रणाली का कार्य केवल पर्याप्त ऑक्सीजन के साथ रक्त की आपूर्ति करना और कार्बन डाइऑक्साइड को हटा देना है।पानी के गठन के साथ आणविक ऑक्सीजन की रासायनिक कमी स्तनधारियों के लिए ऊर्जा का मुख्य स्रोत है। इसके बिना, जीवन कुछ सेकंड से अधिक समय तक नहीं टिक सकता है।ऑक्सीजन में कमी सीओ 2 के गठन के साथ है। सीओ 2 में प्रवेश करने वाले ऑक्सीजन सीधे आणविक ऑक्सीजन से नहीं आते हैं। ओ 2 का उपयोग और सीओ 2 के गठन मध्यवर्ती चयापचय प्रतिक्रियाओं से जुड़े हुए हैं; सैद्धांतिक रूप से, उनमें से प्रत्येक कुछ समय तक रहता है।शरीर और पर्यावरण के बीच ओ 2 और सीओ 2 के आदान-प्रदान को श्वसन कहा जाता है। उच्च जानवरों में, सांस लेने की प्रक्रिया क्रमिक प्रक्रियाओं की एक श्रृंखला के माध्यम से की जाती है।
1. मध्यम और फेफड़ों के बीच गैसों का आदान-प्रदान, जिसे आमतौर पर "फुफ्फुसीय वेंटिलेशन" कहा जाता है।
2. फेफड़ों और रक्त (फुफ्फुसीय श्वसन) के अलवेली के बीच गैस विनिमय।
3. रक्त और ऊतकों के बीच गैस विनिमय।
4. अंत में, गैस ऊतक के अंदर (ओ 2 के लिए) और गठन के स्थानों (सीओ 2 के लिए) (सेलुलर श्वसन) से ऊतक के अंदर गुजरती हैं। इन चार प्रक्रियाओं में से किसी के नुकसान से श्वसन संबंधी विकार होते हैं और मानव जीवन के लिए खतरा पैदा होता है।
1. मानव श्वसन तंत्र की शारीरिक रचना।
मानव श्वसन प्रणाली में ऊतक और अंग होते हैं जो फुफ्फुसीय वेंटिलेशन और फुफ्फुसीय श्वसन प्रदान करते हैं। एयरवेज में नाक, नाक गुहा, नासोफैरेनिक्स, लारेंक्स, ट्रेकेआ, ब्रोंची और ब्रोंचीओल्स शामिल हैं। फेफड़ों में ब्रोंचीओल्स और अलवीय कोशिकाएं होती हैं, साथ ही साथ धमनियों, केशिकाएं और फुफ्फुसीय परिसंचरण की नसों का समावेश होता है। Musculoskeletal प्रणाली की श्वसन प्रणाली से जुड़े तत्व पसलियों, इंटरकोस्टल मांसपेशियों, डायाफ्राम, और सहायक श्वसन मांसपेशियों हैं।
1.1। एयरवेज।
नाक और नाक गुहा हवा के लिए प्रवाहकीय चैनल के रूप में कार्य करता है जिसमें इसे गर्म, आर्द्रता और फ़िल्टर किया जाता है। ओलफैक्टरी रिसेप्टर्स नाक गुहा में भी संलग्न हैं।नाक का बाहरी भाग त्रिकोणीय ओस्टियो-कार्टिलाजिनस कंकाल द्वारा बनाया जाता है, जो त्वचा से ढका हुआ होता है; नीचे की सतह पर दो अंडाकार छेद - प्रत्येक नाक के आकार के नाक गुहा में खुले होते हैं। इन गुहाओं को एक सेप्टम से अलग किया जाता है।नाइट्रिल की तरफ की दीवारों से तीन हल्के स्पॉन्सी कर्ल (गोले) निकलते हैं, आंशिक रूप से गुहा को चार खुले ऐलिस (नाक के मार्ग) में विभाजित करते हैं।नाक गुहा को समृद्ध संवहनी श्लेष्म झिल्ली के साथ रेखांकित किया जाता है। कई कठिन बाल, साथ ही साथ उपजाऊ उपकला और गोबलेट कोशिकाओं का उपयोग सोलिड से श्वास वाली हवा को साफ करने के लिए किया जाता है। गुहा के ऊपरी भाग में घर्षण कोशिकाएं होती हैं।
       लारेंक्स ट्रेकेआ और जीभ की जड़ के बीच स्थित है। लारेंजियल गुहा श्लेष्म झिल्ली के दो गुना से विभाजित होता है, जो पूरी तरह से मध्य रेखा में अभिसरण नहीं होता है। इन गुनाओं के बीच की जगह - glottis एक रेशेदार उपास्थि प्लेट - epiglottis द्वारा संरक्षित है। श्लेष्म झिल्ली में ग्लोटिस के किनारों पर रेशेदार लोचदार अस्थिबंधक होते हैं, जिन्हें निचले, या सच्चे, मुखर फोल्ड (लिगामेंट्स) कहा जाता है। उनके ऊपर झूठी मुखर फोल्ड हैं जो सच्चे मुखर गुनाओं की रक्षा करते हैं और उन्हें नम रखते हैं; वे आपकी सांस पकड़ने में भी मदद करते हैं, और निगलने पर, वे भोजन को लारनेक्स में प्रवेश करने से रोकते हैं। विशिष्ट मांसपेशियों को सच्चे और झूठी मुखर folds कस और आराम। ये मांसपेशियां ध्वन्यात्मक में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, और किसी भी कण को ​​वायुमार्ग में प्रवेश करने से रोकती हैं। ट्रेकेना लारनेक्स के निचले सिरे पर शुरू होती है और छाती गुहा में उतरती है, जहां इसे दाएं और बाएं ब्रोंची में विभाजित किया जाता है; इसकी दीवार संयोजी ऊतक और उपास्थि द्वारा बनाई गई है। अधिकांश स्तनधारियों में, उपास्थि अपूर्ण छल्ले बनाता है। एसोफैगस के आस-पास के हिस्सों को एक रेशेदार लिगामेंट द्वारा प्रतिस्थापित किया जाता है। दायां ब्रोंचस आमतौर पर बाएं से छोटा और व्यापक होता है। फेफड़ों में प्रवेश करते हुए, मुख्य ब्रोंची धीरे-धीरे छोटे और छोटे ट्यूबों (ब्रोंचीओल्स) में विभाजित होते हैं, जिनमें से सबसे छोटा - टर्मिनल ब्रोंचीओल्स वायुमार्ग का अंतिम तत्व हैं। लारनेक्स से टर्मिनल ब्रोंचीओल्स तक, ट्यूबों को सिलीएटेड एपिथेलियम के साथ रेखांकित किया जाता है।
1.फेफड़े।
आम तौर पर, फेफड़ों में छाती गुहा के दोनों हिस्सों पर झुका हुआ स्पंज, छिद्रपूर्ण शंकु संरचनाएं होती हैं। फेफड़ों का सबसे छोटा संरचनात्मक तत्व - लोबुल टर्मिनल ब्रोंकोयल होता है जो फुफ्फुसीय ब्रोंकोयल और अलवीय कोशिका की ओर जाता है। फुफ्फुसीय ब्रोंकोयल और अलवीय थैली की अवसाद अवसाद-अलवेली की दीवारें। फेफड़ों की यह संरचना उनके श्वसन सतह को बढ़ाती है, जो शरीर की सतह से 50-100 गुना अधिक होती है। सतह के सापेक्ष आकार जिसके माध्यम से फेफड़ों में गैस एक्सचेंज होता है, वह उच्च गतिविधि और गतिशीलता वाले पशुओं में अधिक होता है। अल्वेली की दीवारों में उपकला कोशिकाओं की एक परत होती है और फुफ्फुसीय केशिकाओं से घिरा होता है। अल्वेली की भीतरी सतह को सर्फैक्टेंट सर्फैक्टेंट के साथ लेपित किया जाता है। एक सर्फैक्टेंट माना जाता है कि दानेदार सेल स्राव का उत्पाद होता है। एक एकल अलौकिक, जो पड़ोसी संरचनाओं के साथ निकट संपर्क में है, में अनियमित पॉलीहेड्रॉन का आकार और 250 माइक्रोन तक अनुमानित आयाम होते हैं। ऐसा माना जाता है कि अल्वेली की कुल सतह, जिसके माध्यम से गैस एक्सचेंज होता है, शरीर के वजन पर तेजी से निर्भर करता है। उम्र के साथ, alveoli के सतह क्षेत्र में कमी।
फुस्फुस का आवरण।
प्रत्येक फेफड़े pleura के एक बैग से घिरा हुआ है। बाहरी (पैरिटल) फुफ्फुस छाती की दीवार और डायाफ्राम की भीतरी सतह को जोड़ता है, आंतरिक (आंत) फेफड़ों को ढकता है। चादरों के बीच का अंतर फुफ्फुसीय गुहा कहा जाता है। जब छाती के अंदरूनी पुस्तिका आमतौर पर बाहर की ओर स्लाइड करती है। फुफ्फुसीय गुहा में दबाव हमेशा वायुमंडलीय (नकारात्मक) से कम होता है। आराम से, मनुष्यों में अंतःविषय दबाव औसतन, वायुमंडलीय दबाव (-4.5 टोर) के नीचे 4.5 टोर होता है। फेफड़ों के बीच अंतःविषय स्थान को मध्यस्थ कहा जाता है; इसमें ट्रेकेआ, थाइमस ग्रंथि (थाइमस ग्रंथि) और बड़े जहाजों, लिम्फ नोड्स और एसोफैगस वाला दिल होता है।
फेफड़ों के रक्त वाहिकाओं।
फुफ्फुसीय धमनी दिल के दाएं वेंट्रिकल से रक्त लेती है, इसे फेफड़ों में भेजी जाने वाली दाएं और बाएं शाखाओं में विभाजित किया जाता है। ब्रोन्ची के बाद ये धमनी शाखाएं, फेफड़ों की बड़ी संरचनाओं और फार्म केशिकाओं की आपूर्ति करती हैं, जो अलवेली की दीवारों को बांधती हैं। अलवेली में हवा को केशिका में रक्त से अलग किया जाता है:
1) अलवीली की दीवार,
2) केशिका दीवार और कुछ मामलों में
3) उनके बीच एक मध्यवर्ती परत।
केशिकाओं से, रक्त छोटी नसों में प्रवेश करता है, जो अंततः विस्फोटक नसों को विलय और बना देता है जो बाएं आलिंद को रक्त प्रदान करता है।
महान सर्कल की ब्रोन्कियल धमनी भी फेफड़ों में रक्त लाती है, अर्थात् ब्रोंची और ब्रोंचीओल्स, लिम्फ नोड्स, रक्त वाहिकाओं की दीवारों और फुफ्फुस की आपूर्ति करती है। इनमें से अधिकांश रक्त ब्रोन्कियल नसों में बहती है, और वहां से unpaired (दाएं) और अर्द्ध unpaired (बाएं) तक। धमनी ब्रोन्कियल रक्त की एक बहुत छोटी मात्रा फुफ्फुसीय नसों में प्रवेश करती है।
श्वसन मांसपेशियों।
श्वसन मांसपेशियां उन मांसपेशियों हैं जिनके संकुचन छाती की मात्रा को बदलते हैं। स्नायु, सिर, गर्दन, हाथ, और ऊपरी वक्ष के कुछ और कम सर्वाइकल वर्टिब्रा, और बाहरी पसलियों के बीच मांसपेशियों से ही, किनारे के रिब को जोड़ने, पसलियों लिफ्ट और छाती की मात्रा में वृद्धि। कशेरुक-मांसपेशी-टेंडन प्लेट, कशेरुका, पसलियों और स्टर्नम से जुड़ी हुई, पेट से छाती गुहा को अलग करती है। यह सामान्य प्रेरणा में शामिल मुख्य मांसपेशी है। बढ़ी प्रेरणा के साथ, अतिरिक्त मांसपेशियों के समूह कम हो जाते हैं। बढ़ाया निःश्वास मांसपेशियों पसलियों (आंतरिक पसलियों के बीच मांसपेशियों), पसलियों और कम वक्ष और काठ का ऊपरी और पेट की मांसपेशियों को कशेरुकाओं के बीच जुड़े होते हैं जब; वे पसलियों को कम करते हैं और पेट के अंगों को आराम से डायाफ्राम पर दबाते हैं, इस प्रकार छाती की क्षमता को कम करते हैं।
पल्मोनरी वेंटिलेशन।
जब तक अंतःविषय दबाव वायुमंडलीय दबाव से नीचे रहता है, फेफड़ों के आयाम छाती गुहा के आयामों का बारीकी से पालन करते हैं। फेफड़ों की गति छाती की दीवार और डायाफ्राम के कुछ हिस्सों के आंदोलन के साथ संयोजन में श्वसन मांसपेशियों के संकुचन के परिणामस्वरूप होती है।
श्वसन आंदोलन।
सभी सांस लेने से संबंधित मांसपेशियों को आराम से छाती को एक निष्क्रिय समाप्ति स्थिति देता है। उचित मांसपेशियों की गतिविधि इस स्थिति को सांस में अनुवाद कर सकती है या निकास को मजबूत कर सकती है।
छाती गुहा के विस्तार से सांस बनाई जाती है और हमेशा एक सक्रिय प्रक्रिया होती है। कशेरुकाओं पसलियों के साथ अपनी अभिव्यक्ति के कारण ऊपर की ओर और बाहर ले जाते हैं, रीढ़ की हड्डी से दूरी उरोस्थि के लिए और वक्ष गुहा के पार्श्व आयाम (सांस लेने की पसली या पसली प्रकार) बढ़ रही है डायाफ्राम को कम करने से इसका आकार एक गुंबद से एक फ्लैट तक बदल जाता है, जो अनुदैर्ध्य दिशा (छाती या पेट में सांस लेने) में छाती गुहा के आकार को बढ़ाता है। आमतौर पर प्रेरणा में मुख्य भूमिका डायाफ्रामेटिक श्वास है। चूंकि मनुष्यों को द्विपक्षीय होते हैं, पसलियों और स्टर्नम के प्रत्येक आंदोलन के साथ, शरीर की गुरुत्वाकर्षण का केंद्र बदलता है और इस विभिन्न मांसपेशियों को अनुकूलित करने की आवश्यकता होती है।
शांत श्वास के साथ, एक व्यक्ति के पास आम तौर पर इनहेल से पहले की स्थिति में लौटने के लिए चले गए ऊतकों के पर्याप्त लोचदार गुण और वजन होते हैं।इस प्रकार, मांसपेशियों की गतिविधि में क्रमिक कमी के कारण, श्वास के लिए एक शर्त पैदा करने के कारण आराम से निकास निष्क्रिय रूप से होता है। सक्रिय साँस छोड़ना अन्य मांसपेशी समूहों के अलावा आंतरिक पसलियों के बीच मांसपेशियों की कमी के कारण हो सकता को छोड़ देता है कि पसलियों छाती गुहा की अनुप्रस्थ आयाम और उरोस्थि और रीढ़ की हड्डी के बीच की दूरी को कम। सक्रिय निकास पेट की मांसपेशियों के संकुचन के कारण भी हो सकता है, जो आराम से डायाफ्राम के अंदर की ओर दबाता है और छाती गुहा के अनुदैर्ध्य आकार को कम करता है।
फेफड़ों का विस्तार कुल intrapulmonary (अलौकिक) दबाव कम करता है (थोड़ी देर के लिए)। यह वायुमंडलीय के बराबर है, जब हवा नहीं चल रही है, और ग्लॉटिस खुला है। यह वायुमंडलीय से नीचे है, जब तक फेफड़े इनहेलेशन के साथ भरें, और निकास के दौरान वायुमंडलीय से ऊपर। इंट्राप्लरल दबाव भी श्वसन आंदोलन में भिन्न होता है; लेकिन यह हमेशा वायुमंडलीय से नीचे है (यानी हमेशा ऋणात्मक)।
फेफड़ों की मात्रा में परिवर्तन।
मनुष्यों में, फेफड़ों के वजन के बावजूद, शरीर की मात्रा का लगभग 6% भाग लेते हैं। फेफड़ों की मात्रा प्रेरणा के साथ बदलती है हर जगह एक जैसी नहीं है। इसके लिए तीन मुख्य कारण हैं: सबसे पहले, छाती गुहा सभी दिशाओं में असमान रूप से बढ़ जाती है, और दूसरी बात, फेफड़ों के सभी हिस्सों को समान रूप से फैला नहीं जाता है। तीसरा, यह एक गुरुत्वाकर्षण प्रभाव का अस्तित्व माना जाता है, जो फेफड़े के विस्थापन में योगदान देता है।
सामान्य (गैर-एम्पलीफाइड) श्वास के दौरान श्वास की जाने वाली हवा की मात्रा और सामान्य (गैर-एम्पलीफाइड) निकास के दौरान निकाले जाने पर श्वसन वायु कहा जाता है। पिछले अधिकतम श्वास के बाद अधिकतम समाप्ति की मात्रा को महत्वपूर्ण क्षमता कहा जाता है। यह फेफड़ों (फेफड़ों की कुल मात्रा) में हवा की पूरी मात्रा के बराबर नहीं है, क्योंकि फेफड़े पूरी तरह से पतन नहीं होते हैं। संचित फेफड़ों में रहने वाली हवा की मात्रा को अवशिष्ट हवा कहा जाता है।सामान्य श्वास के बाद अधिकतम मात्रा में श्वास लिया जा सकता है।और एक सामान्य निकासी के बाद अधिकतम प्रयास से निकाली गई हवा निकास की आरक्षित मात्रा है। कार्यात्मक अवशिष्ट क्षमता में निकास और अवशिष्ट मात्रा की आरक्षित मात्रा होती है। यह फेफड़ों में हवा है जिसमें सामान्य श्वसन हवा पतला हो जाती है। नतीजतन, एक श्वसन आंदोलन के बाद फेफड़ों में गैस की संरचना आमतौर पर नाटकीय रूप से बदलती नहीं है।
मिनट की मात्रा वी हवा एक मिनट में सांस ली गई है। यह प्रति मिनट (एफ), या वी = एफवीटी की सांसों की संख्या से औसत ज्वारीय मात्रा (Vt) गुणा करके गणना की जा सकती है।उदाहरण के लिए, Vt का हिस्सा, टर्मिनल ब्रोंचीओल्स और कुछ अल्वेली में ट्रेकेआ और ब्रोंची में हवा, गैस एक्सचेंज में भाग नहीं लेता है, क्योंकि यह सक्रिय फुफ्फुसीय बिस्तर के संपर्क में नहीं आता है - यह तथाकथित "मृत" अंतरिक्ष (वीडी) है। फुफ्फुसीय रक्त के साथ गैस एक्सचेंज में शामिल वीटी का हिस्सा अलवीय मात्रा (वीए) कहा जाता है।एक शारीरिक दृष्टि से, अलवीय वेंटिलेशन (वीए) बाह्य श्वसन, वीए = एफ (वीटी-वीडी) का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है, क्योंकि यह श्वास वाली हवा प्रति मिनट की मात्रा है जो फुफ्फुसीय केशिकाओं के रक्त के साथ गैसों का आदान-प्रदान करता है।
पल्मोनरी श्वसन।
गैस ऐसी स्थिति है जहां इसे सीमित मात्रा में समान रूप से वितरित किया जाता है। गैस चरण में, एक दूसरे के साथ अणुओं की बातचीत नगण्य है।जब वे एक बंद जगह की दीवारों के साथ टकराते हैं, तो उनका आंदोलन एक निश्चित बल बनाता है; इस बल को क्षेत्र की एक इकाई पर लागू किया जाता है जिसे गैस दबाव कहा जाता है और इसे पारा या टॉर के मिलीमीटर में व्यक्त किया जाता है; गैस का दबाव अणुओं की संख्या और उनके औसत वेग के अनुपात में आनुपातिक है। कमरे के तापमान पर, किसी भी प्रकार के अणुओं का दबाव; उदाहरण के लिए, ओ 2 या एन 2, किसी अन्य गैस के अणुओं की उपस्थिति पर निर्भर नहीं है। कुल मापा गया गैस दबाव अलग-अलग प्रकार के अणुओं (तथाकथित आंशिक दबाव) या आरबी = आरएन 2 + Ро2 + Рн2o + РB के दबावों के बराबर होता है, जहां आरबी बैरोमेट्रिक दबाव होता है।
सूखे गैस मिश्रण में किसी दिए गए गैस (एक्स) के अंश (एफ) को निम्नलिखित समीकरण का उपयोग करके शक्तिशाली गणना की जाती है:इसके विपरीत, पुराने गैस (x) का आंशिक दबाव इसकी हिस्सेदारी से गणना की जा सकती है: Рx-Fx (РB-Рн2o)। सूखी वायुमंडलीय हवा में 2 ओ, 94% ओ 2 * Po2 = 20.94 / 100 * 760 Torr (समुद्र स्तर पर) = 15 9 .1 Torr शामिल है।अलवेली और रक्त के बीच फेफड़ों में गैस एक्सचेंज प्रसार से होता है। अंतर अणु गैस अणुओं के निरंतर आंदोलन के कारण होता है और अणुओं को उनके उच्च सांद्रता से उस क्षेत्र तक स्थानांतरित करता है जहां उनकी एकाग्रता कम होती है।
श्वसन गैसों का परिवहन।
ओ के बारे में, सामान्य Ro2 पर महान सर्कल के धमनी रक्त में निहित ओ 2 का 3% प्लाज्मा में भंग कर दिया जाता है। बाकी सभी एरिथ्रोसाइट्स के हीमोग्लोबिन (एचबी) के साथ नाजुक रासायनिक यौगिक में हैं। हेमोग्लोबिन एक प्रोटीन है जिसमें लोहा युक्त समूह होता है। प्रत्येक हीमोग्लोबिन अणु का Fe + एक ओ 2 अणु के साथ कमजोर और विपरीत रूप से जोड़ता है। पूरी तरह से ऑक्सीजनयुक्त हीमोग्लोबिन में 1.3 9 मिलीलीटर होता है। ओ 2 प्रति 1 जी एचबी (कुछ स्रोतों में 1.34 मिलीलीटर इंगित किया गया है), यदि Fe + को Fe + में ऑक्सीकरण किया जाता है, तो इस तरह के एक यौगिक ओ 2 को ले जाने की क्षमता खो देता है।पूरी तरह से ऑक्सीजनयुक्त हीमोग्लोबिन (एचबीओ 2) में कम हीमोग्लोबिन (एचबी) की तुलना में मजबूत अम्लीय गुण होते हैं। नतीजतन, 7.25 के पीएच वाले समाधान में, एचबीओ 2 से 1 एमएम ओ 2 की रिहाई से पीएच को बदलने के बिना ओ, 7 एमएम एच + का आकलन संभव हो जाता है; इस प्रकार, ओ 2 के रिलीज में बफर प्रभाव होता है।
ऊतकों का ऑक्सीजनेशन।
रक्त से ऊतक के उन हिस्सों में रक्त से ओ 2 का परिवहन जहां इसका उपयोग किया जाता है, सरल प्रसार से होता है।चूंकि ऑक्सीजन मुख्य रूप से माइटोकॉन्ड्रिया में उपयोग किया जाता है, इसलिए ऊतकों में प्रसार होने पर दूरी फेफड़ों के आदान-प्रदान की तुलना में बड़ी दिखाई देती है। मांसपेशी ऊतक में, मायोग्लोबिन की उपस्थिति ओ 2 के प्रसार को सुविधाजनक बनाने के लिए माना जाता है। ऊतक Po2 की गणना करने के लिए, सैद्धांतिक रूप से, मॉडल बनाए गए हैं जो ओ 2 के प्रवाह और खपत को प्रभावित करने वाले कारकों के लिए प्रदान करते हैं, अर्थात् केशिकाओं के बीच की दूरी, केशिकाओं में बिस्तर, और ऊतक चयापचय।
सबसे कम Po2 शिरापरक अंत में और केशिकाओं के बीच आधे रास्ते में स्थापित है, अगर हम मानते हैं कि केशिका में बिस्तर समान हैं और वे समानांतर हैं।
2. स्वच्छता सांस लेने।
फिजियोलॉजी सबसे महत्वपूर्ण गैस ओ 2, सीओ 2, एन 2 हैं। वे तालिका में संकेत अनुपात में वायुमंडलीय हवा में मौजूद हैं। 1. इसके अलावा, वायुमंडल में अत्यधिक परिवर्तनीय मात्रा में जल वाष्प होता है।
दवा के दृष्टिकोण से, हाइपोक्सिया ऊतकों को ऑक्सीजन की अपर्याप्त आपूर्ति के साथ होता है।हाइपोक्सिया के विभिन्न कारणों का एक संक्षिप्त सारांश सभी श्वसन प्रक्रियाओं के संक्षिप्त अवलोकन के रूप में भी कार्य कर सकता है। प्रत्येक अनुच्छेद में नीचे एक या अधिक प्रक्रियाओं का उल्लंघन है।
सिस्टमटाइजेशन उन्हें इन सभी घटनाओं को एक साथ विचार करने की अनुमति देता है।
I. अपर्याप्त रक्त ओ 2 परिवहन (एनोक्सेमिक हाइपोक्सिया) (महान सर्कल के धमनी रक्त में ओ 2 सामग्री कम हो जाती है)।
ए कम पीओ 2:
1) हवा में ओ 2 की कमी हम सांस लेते हैं;
2) फुफ्फुसीय वेंटिलेशन में कमी;
3) अल्वेली और रक्त के बीच गैस एक्सचेंज में कमी;
4) एक बड़े और छोटे सर्कल के रक्त मिश्रण,
बी सामान्य पीओ 2:
1) हीमोग्लोबिन (एनीमिया) में कमी;
2) O2 संलग्न करने की अक्षम hemoglobin क्षमता
द्वितीय। अपर्याप्त रक्त परिवहन (हाइपोकिनेटिक हाइपोक्सिया)।
ए अपर्याप्त रक्त आपूर्ति:
1) पूरे कार्डियोवैस्कुलर सिस्टम (दिल की विफलता) में
2) स्थानीय (व्यक्तिगत धमनियों के अवरोध)
बी रक्त बहिर्वाह का उल्लंघन;
1) कुछ नसों की रोकथाम;
बी बढ़ी जरूरत के साथ अपर्याप्त रक्त आपूर्ति।
तृतीय। आने वाले ओ 2 (हिस्टोटोक्सिक हाइपोक्सिया) का उपयोग करने के लिए ऊतक की अक्षमता।
3. फुफ्फुसीय बीमारियों का परिचय।
हर जगह, विशेष रूप से औद्योगिक देशों में, श्वसन तंत्र की बीमारियों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो मृत्यु दर के कारणों में 3-4 वें स्थान पर पहुंच चुकी है। उदाहरण के लिए, फेफड़ों का कैंसर, इसके प्रसार में यह रोगविज्ञान पुरुषों में अन्य सभी घातक neoplasms से आगे है। घटना दर में इस तरह की वृद्धि मुख्य रूप से परिवेश वायु, धूम्रपान, और आबादी के बढ़ते एलर्जीकरण (मुख्य रूप से घरेलू रसायनों के कारण) के बढ़ते प्रदूषण के साथ जुड़ी हुई है। यह सब वर्तमान में समय पर निदान, प्रभावी उपचार और श्वसन रोगों की रोकथाम की तात्कालिकता को निर्धारित करता है। इस समस्या का समाधान फुफ्फुसीय विज्ञान (लैटिनो से है - पुल्मोइस - फेफड़े, ग्रीक। - लोगो - शिक्षण), जो आंतरिक चिकित्सा के वर्गों में से एक है।
अपने दैनिक अभ्यास में, डॉक्टर को श्वसन प्रणाली के विभिन्न रोगों से निपटना पड़ता है। बाह्य रोगी सेटिंग में, विशेष रूप से वसंत-शरद ऋतु की अवधि में, तीव्र लैरींगिटिस, तीव्र ट्रेकेसाइटिस, तीव्र और क्रोनिक ब्रोंकाइटिस जैसी बीमारियां अक्सर मिलती हैं। अस्पताल में विभागों अक्सर तीव्र और जीर्ण निमोनिया, ब्रोन्कियल अस्थमा, सूखा और स्त्रावी परिफुफ्फुसशोथ, फेफड़े के वातस्फीति और फेफड़े के दिल की विफलता के रोगियों के उपचार में चिकित्सकीय प्रोफ़ाइल कर रहे हैं। ब्रोंकाइक्टेसिस, फोड़े और फेफड़ों के ट्यूमर वाले मरीजों को परीक्षा और उपचार के लिए शल्य चिकित्सा विभागों में आते हैं।
श्वसन रोगों वाले रोगियों की परीक्षा और उपचार में उपयोग किए जाने वाले नैदानिक ​​और उपचारात्मक एजेंटों का आधुनिक शस्त्रागार बहुत व्यापक है। spirography और स्पिरोमेट्री (परिभाषा और श्वसन समारोह की विशेषता विशेष मापदंडों के ग्राफिक पंजीकरण) vnevmotahografiya और pneumotachometry (अनुसंधान अधिकतम अंतरिक्ष वेग मजबूर प्रश्वसनीय - ये विभिन्न प्रयोगशाला तरीकों (। जैव रासायनिक, प्रतिरक्षा, जीवाणु एट अल), कार्यात्मक निदान विधियों में शामिल हैं और निकास), रक्त में ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड की सामग्री (आंशिक दबाव) का अध्ययन आदि।
श्वसन तंत्र की जांच के लिए विभिन्न एक्स-रे विधियां बहुत ही जानकारीपूर्ण हैं: फ्लोरोसॉपी और छाती एक्स-रे, एक्स-रे (एक विशेष डिवाइस का उपयोग कर एक्स-रे जो आपको आकार में 70X70 मिमी की तस्वीरें लेने की अनुमति देती है, जनसंख्या की जन प्रोफाइलैक्टिक परीक्षाओं में उपयोग की जाती है), टोमोग्राफी ट्यूमर संरचनाओं की प्रकृति का मूल्यांकन), ब्रोंगोग्राफिया, एक परिचय की मदद से अवसर प्रदान करते हैं ब्रोन्कियल पेड़ की एक स्पष्ट छवि प्राप्त करने के लिए विपरीत एजेंटों के कैथेटर के माध्यम से ओन्ची।
श्वसन अंगों की बीमारियों के निदान में एक महत्वपूर्ण स्थान अनुसंधान के एंडोस्कोपिक तरीकों से लिया जाता है, जो ट्रेकेआ और ब्रोंची के श्लेष्म झिल्ली का एक दृश्य निरीक्षण है और एक विशेष ऑप्टिकल उपकरण - ब्रोंकोस्कोप का परिचय है।ब्रोंकोस्कोपी वर्ण सेट ब्रोन्कियल म्यूकोसा के विनाश (जैसे, ब्रोंकाइटिस, और ब्रोन्किइक्टेसिस) और ट्यूमर संदंश टुकड़ा उसके ऊतक (बायोप्सी), एक रूपात्मक अध्ययन के बाद का उपयोग कर श्वसनी लेने की पहचान करने की अनुमति देता है, ब्रोन्कियल लेवेज जीवाणु या कोशिका विज्ञान के लिए पानी प्राप्त करते हैं। कई मामलों में, ब्रोंकोस्कोपी चिकित्सीय उद्देश्यों के लिए भी किया जाता है। उदाहरण के लिए, ब्रोंकाइक्टेसिस, गंभीर ब्रोन्कियल अस्थमा के मामले में, ब्रोन्कियल पेड़ को चिपचिपा या पुष्पशील शुक्राणु के बाद के सक्शन और दवाओं के प्रशासन के साथ पुनर्गठित करना संभव है।
श्वसन तंत्र की बीमारियों वाले मरीजों की देखभाल में आमतौर पर अन्य अंगों और शरीर प्रणालियों की कई बीमारियों के लिए कई सामान्य गतिविधियां शामिल होती हैं।इस प्रकार, के साथ लोबार निमोनिया आवश्यक सख्ती से सभी नियमों और ज्वर रोगी की देखभाल आवश्यकताओं (शरीर के तापमान की नियमित माप और पालन करने के लिए पत्रक के तापमान, हृदय और केंद्रीय तंत्रिका तंत्र, मौखिक देखभाल, आपूर्ति पोत और मूत्रालय, समय पर परिवर्तन जांघिया के राज्य के अवलोकन को बनाए रखने अंडरवियर, इत्यादि) रोगी और बिस्तर पर लंबे समय तक रहने के साथ, त्वचा की सावधानीपूर्वक देखभाल और बेडसोर्स की रोकथाम पर विशेष ध्यान दें। हालांकि, श्वसन रोगों वाले मरीजों की देखभाल करने से खांसी, हेमोप्टाइसिस, सांस की तकलीफ और अन्य लक्षणों की उपस्थिति से संबंधित कई अतिरिक्त उपायों का भी अर्थ है।
खाँसी।
खाँसी एक slozhnoreflektorny अधिनियम है, जो तंत्र (श्वास मांसपेशियों द्वारा इन्त्रथोरासिक दबाव में वृद्धि आदि परिवर्तन वोल्टेज लुमेन कंठद्वार,) शामिल है और जलन की वजह से आमतौर पर रिसेप्टर्स और फुस्फुस का आवरण airway है श्वसन रोगों में जो है। श्वसन प्रणाली के विभिन्न रोगों में खांसी होती है - लैरींगजाइटिस, ट्रेकेइटिस, तीव्र और क्रोनिक ब्रोंकाइटिस, निमोनिया, आदि। यह रक्त परिसंचरण (हृदय दोषों के साथ) के छोटे सर्कल में रक्त के स्थगन के साथ भी जुड़ा जा सकता है, और कभी-कभी केंद्रीय मूल होता है।
खांसी सूखी या गीली होती है और अक्सर ब्रोंची से सामग्री को हटाने में मदद करने वाली सुरक्षात्मक भूमिका निभाती है (उदाहरण के लिए, स्पुतम)। हालांकि, एक सूखी, विशेष रूप से दर्दनाक खांसी, रोगियों को टायर करती है और उम्मीदवार दवाओं (थर्मोप्सी की तैयारी, और पेकोकोन्स) और एंटीट्यूसिव (libexin, glaucine, आदि) के उपयोग की आवश्यकता होती है। ऐसे मामलों में, रोगियों के लिए गर्म क्षारीय गर्मी (बोर्ज़ोम के साथ गर्म दूध या सोडा के एक चम्मच के साथ गर्म दूध), डिब्बे, सरसों के प्लास्टर की सिफारिश करने की सलाह दी जाती है।अक्सर खांसी कफ के साथ: श्लेष्मा, बेरंग, चिपचिपा (जैसे, ब्रोन्कियल अस्थमा), mucopurulent (यदि श्वसनीफुफ्फुसशोथ), पीप (फेफड़ों श्वसनी के लुमेन में ब्रेक में फोड़ा)।
स्पुतम का मुक्त निर्वहन प्राप्त करना बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसकी देरी (उदाहरण के लिए, ब्रोंकाइक्टेसिस रोग, फेफड़े की फोड़ा के मामले में) शरीर विषाक्तता को बढ़ाती है। इसलिए, रोगी को एक स्थिति (तथाकथित जल निकासी, एक तरफ या दूसरी तरफ, पीछे की ओर) खोजने में मदद मिली है, जिसमें स्पुतम पूरी तरह से निकलता है, यानी। ब्रोन्कियल पेड़ की प्रभावी जल निकासी। मरीज की निर्दिष्ट स्थिति 20-30 मिनट के लिए दिन में एक बार लेनी चाहिए।
हेमोप्टाइसिस और फुफ्फुसीय रक्तस्राव।
हेमोप्टाइसिस रक्त के साथ मिश्रित स्पुतम की रिहाई है, समान रूप से मिश्रित (उदाहरण के लिए, फेफड़ों के कैंसर में "रास्पबेरी जेली" के रूप में घुलनशील निमोनिया में "जंगली" स्पुतम) या अलग नसों में स्थित)।रक्त की एक महत्वपूर्ण मात्रा के श्वसन पथ के माध्यम से विसर्जन (खांसी के झटकों के साथ, कम से कम - एक सतत धारा) फुफ्फुसीय रक्तस्राव कहा जाता है।हेमोप्टाइसिस और फुफ्फुसीय रक्तस्राव घातक ट्यूमर, गैंग्रीन, फुफ्फुसीय इंफार्क्शन, तपेदिक, ब्रोंकाइक्टेसिस, चोटों और फेफड़ों की चोटों के साथ-साथ मिथल हृदय रोग में भी सबसे आम है।फुफ्फुसीय रक्तस्राव की उपस्थिति में, कभी-कभी गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल रक्तस्राव से इसे अलग करने के लिए आवश्यक होता है, जो खून के मिश्रण के साथ उल्टी द्वारा प्रकट होता है।
ऐसे मामलों में, यह याद रखना चाहिए कि फुफ्फुसीय रक्तचाप को फेंको, लाल रंग के रक्त की रिहाई की विशेषता है जिसमें क्षारीय प्रतिक्रिया होती है और कोगलेट होता है, जबकि गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल रक्तस्राव (हालांकि हमेशा नहीं) के साथ, काले रक्त के थक्के अधिक आम होते हैं, जैसे कि कॉफी के मैदान, टुकड़ों के साथ मिश्रित एसिड प्रतिक्रिया के साथ भोजन।हेमोप्टाइसिस और विशेष रूप से फुफ्फुसीय रक्तस्राव बहुत गंभीर लक्षण हैं जिनके लिए उनके कारण के तत्काल दृढ़ संकल्प की आवश्यकता होती है - छाती की एक्स-रे परीक्षा, टोमोग्राफी, ब्रोंकोस्कोपी, ब्रोंकोोग्राफी, और कभी-कभी एंजियोग्राफी के साथ।
हेमोप्टाइसिस और फुफ्फुसीय रक्तस्राव आमतौर पर सदमे या पतन के साथ नहीं होते हैं। श्वास पथ में रक्त के प्रवेश के परिणामस्वरूप, ऐसे मामलों में जीवन के लिए खतरे आमतौर पर फेफड़ों के खराब वेंटिलेशन से जुड़ा होता है। मरीजों को पूरा आराम निर्धारित किया। स्वस्थ फेफड़ों में प्रवेश करने से बचने के लिए उन्हें प्रभावित फेफड़ों की ओर झुकाव के साथ आधा बैठे स्थान दिया जाना चाहिए। छाती के एक ही हिस्से में एक बर्फ पैक रखा जाता है। गहन खांसी के साथ, रक्तस्राव में वृद्धि में योगदान, यह antitussives का उपयोग किया जाता है।
इंट्रामस्क्यूलर प्रशासित विकसोल, इंट्रावेनस - कैल्शियम क्लोराइड, ईपीएसलॉन एमिनोकैप्रोइक एसिड रक्तस्राव को रोकने के लिए। कभी-कभी तत्काल ब्रोंकोस्कोपी के साथ, एक विशेष हेमोस्टैटिक स्पंज के साथ रक्तस्राव पोत को टंप करना संभव है।कुछ मामलों में, सवाल तत्काल सर्जिकल हस्तक्षेप के बारे में उठता है।
सांस की तकलीफ
श्वसन तंत्र की सबसे आम बीमारियों में से एक श्वास की कमी है, जो आवृत्ति, गहराई और सांस लेने की ताल में बदलाव से विशेषता है। श्वास की तीव्रता के साथ सांस लेने में तेज वृद्धि हो सकती है, और इसके कमी से, इसकी रोकथाम हो सकती है। सांस लेने के किस चरण के आधार पर यह मुश्किल हो जाता है, प्रेरणादायक डिस्पने (सांस लेने में कठिनाई से प्रकट होता है, उदाहरण के लिए, जब ट्रेकेआ और बड़े ब्रोंची को संकुचित किया जाता है), एक्सपिरेटरी डिस्पने (सांस लेने में कठिनाई की विशेषता है, और चिपचिपा स्राव के लुमेन में ) और मिश्रित।
श्वसन प्रणाली की कई तीव्र और पुरानी बीमारियों में सांस की तकलीफ होती है। इसके घटना के लिए कारण ज्यादातर मामलों में रक्त का गैस संरचना में परिवर्तन है वहाँ - वृद्धि हुई कार्बन डाइऑक्साइड सामग्री और ऑक्सीजन सामग्री कमी, एसिड ओर करने के लिए रक्त पीएच की एक पारी के साथ, सांस की केंद्र की मध्य और परिधीय Chemoreceptors उत्तेजना की उत्तेजना के द्वारा पीछा किया और आवृत्ति और सांस लेने की गहराई बदल जाते हैं।
डिस्पने श्वसन विफलता का प्रमुख अभिव्यक्ति है - एक ऐसी स्थिति जिसमें एक व्यक्ति की बाह्य श्वसन प्रणाली रक्त की सामान्य गैस संरचना प्रदान नहीं कर सकती है या जब यह संरचना केवल बाहरी श्वसन प्रणाली के अत्यधिक तनाव के कारण बनाए रखा जाता है। श्वसन विफलता तीव्रता से हो सकती है (उदाहरण के लिए, एक विदेशी निकाय द्वारा श्वसन पथ को बंद करने के साथ) या क्रोनिक रूप से आगे बढ़ें, धीरे-धीरे लंबे समय तक बढ़ रहे हैं (उदाहरण के लिए, फेफड़ों के एम्फिसीमा के दौरान)।
सांस की गंभीर कमी की अचानक शुरुआत को चोकिंग (अस्थमा) कहा जाता है। एस्फेक्सिएशन, जो ब्रोन्कियल पेटेंसी के तीव्र उल्लंघन का परिणाम है - ब्रोंची का एक स्पैम, उनके श्लेष्म झिल्ली के एडीमा, चिपचिपा स्पुतम के लुमेन में संचय - को ब्रोन्कियल अस्थमा का हमला कहा जाता है। ऐसे मामलों में जहां उपचार बाएं वेंट्रिकल की कमजोरी के कारण होता है, कार्डियक अस्थमा के बारे में बात करना परंपरागत होता है, कभी-कभी फुफ्फुसीय edema में बदल जाता है।सांस की तकलीफ से पीड़ित मरीजों की देखभाल, आवृत्ति, ताल और सांस लेने की गहराई की निरंतर निगरानी के लिए प्रदान करता है। श्वास की आवृत्ति (छाती या पेट की दीवार के आंदोलन से) की दृढ़ संकल्प रोगी के लिए अनिवार्य रूप से किया जाता है (इस बिंदु पर, हाथ की स्थिति कुछ नाड़ी आवृत्तियों को अनुकरण कर सकती है)। एक स्वस्थ व्यक्ति में, श्वसन दर 1 मिनट में 16 से 20 तक भिन्न होती है, नींद के दौरान घटती है और व्यायाम के दौरान बढ़ती है। ब्रोंची और फेफड़ों की विभिन्न बीमारियों में, श्वसन दर 1 मिनट में 30-40 या उससे अधिक तक पहुंच सकती है। श्वसन की आवृत्ति को गिनने के परिणाम दैनिक तापमान शीट में योगदान देते हैं। इसी बिंदु एक नीले रंग के पेंसिल से जुड़े होते हैं, जो श्वास की आवृत्ति की ग्राफिक वक्र बनाते हैं। जब डिस्पने दिखाई देता है, तो रोगी को ऊंचा (आधा बैठे) स्थिति दी जाती है, जिससे उसे कपड़ों को बाधित करने से मुक्त किया जाता है, नियमित वेंटिलेशन के माध्यम से ताजा हवा प्रदान किया जाता है। गंभीर श्वसन विफलता के मामले में, ऑक्सीजन थेरेपी का प्रदर्शन किया जाता है।
      ऑक्सीजन थेरेपी के तहत औषधीय उद्देश्यों के लिए ऑक्सीजन के उपयोग को समझते हैं। श्वसन अंगों की बीमारियों में, तीव्र और पुरानी श्वसन विफलता के मामले में ऑक्सीजन थेरेपी का उपयोग साइनोसिस (त्वचा की साइनोसिस) के साथ, दिल की दर में वृद्धि (टैचिर्डिया), 70 मिमी एचजी से कम ऊतक में ऑक्सीजन के आंशिक दबाव में कमी के कारण होता है।शुद्ध ऑक्सीजन का निकास सूखे मुंह की घटना में प्रकट होने वाले मानव शरीर पर एक जहरीला प्रभाव हो सकता है, जिससे स्टर्नम, सीने में दर्द, ऐंठन आदि के पीछे जलन हो सकती है, इसलिए आमतौर पर 80% ऑक्सीजन युक्त गैस मिश्रण का इलाज के लिए उपयोग किया जाता है (अक्सर 40 -60%)। आधुनिक उपकरण जो रोगी को शुद्ध ऑक्सीजन की आपूर्ति करने की अनुमति नहीं देते हैं, लेकिन एक ऑक्सीजन समृद्ध मिश्रण। कार्बन मोनोऑक्साइड विषाक्तता (कार्बन मोनोऑक्साइड) के साथ ही कार्बोजन का उपयोग 95% ऑक्सीजन और 5% कार्बन डाइऑक्साइड युक्त करना संभव है। कुछ मामलों में, इनहेलेशन हीलियम-ऑक्सीजन मिश्रण का उपयोग करके श्वसन विफलता के उपचार में 60-70 जैल और 30-40% ऑक्सीजन होता है।
फुफ्फुसीय edema के लिए, जो श्वसन पथ से फोमयुक्त तरल पदार्थ के साथ होता है, 50% ऑक्सीजन और 50% इथेनॉल युक्त मिश्रण का उपयोग किया जाता है, जिसमें अल्कोहल एंटीफॉम की भूमिका निभाता है।
ऑक्सीजन थेरेपी प्राकृतिक श्वास के साथ और चिकित्सा वेंटिलेटर के उपयोग के साथ दोनों किया जा सकता है। ऑक्सीजन थेरेपी के उद्देश्य से घर पर ऑक्सीजन तकिए का इस्तेमाल किया जाता है। इस मामले में, मरीज एक ट्यूब या एक तकिया मुखपत्र के माध्यम से ऑक्सीजन को सांस लेता है, जिसे वह कसकर अपने होंठों के चारों ओर लपेटता है।समाप्ति के दौरान ऑक्सीजन के नुकसान को कम करने के लिए, इसकी आपूर्ति अस्थायी रूप से ट्यूब को आपकी अंगुलियों से या विशेष टैप करके क्लैंप करके रोक दी जाती है।
      अस्पतालों में, ऑक्सीजन थेरेपी को सिलेंडर का उपयोग संपीड़ित ऑक्सीजन या वार्ड को केंद्रीकृत ऑक्सीजन आपूर्ति की प्रणाली के साथ किया जाता है। सबसे आम तरीका, नाक कैथेटर, जो एक गहराई कान पालि के लिए नाक के पंखों से दूरी लगभग बराबर करने के लिए नासिका मार्ग में पेश किया जाता है के माध्यम से अपने ऑक्सीजन साँस लेना है शायद ही कभी नाक और मौखिक मुखौटा, अंतःश्वासनलीय और ट्रेकियोस्टोमी ट्यूबों, ऑक्सीजन टेंट, तंबू का इस्तेमाल किया।ऑक्सीजन मिश्रण का श्वास लगातार या 30-60 मिनट के सत्र में किया जाता है। दिन में कई बार। साथ ही यह आवश्यक है कि आपूर्ति की गई ऑक्सीजन आवश्यक रूप से गीली हो। पानी के साथ एक जहाज के माध्यम से, या विशेष इनहेलर्स का उपयोग करके ऑक्सीजन की नमी को गैस मिश्रण में छोटी पानी की बूंदों का निलंबन बनाकर हासिल किया जाता है।
4. चिकित्सीय शारीरिक संस्कृति के तरीकों की बुनियादी बातों श्वसन रोगों के साथ।
श्वसन अंगों की बीमारियों के लिए चिकित्सीय शारीरिक संस्कृति के वर्गों में, सामान्यीकरण और विशेष (श्वसन सहित) अभ्यास का उपयोग किया जाता है।टोनिंग अभ्यास, सभी अंगों और प्रणालियों के कार्य में सुधार, सांस लेने पर सक्रिय प्रभाव पड़ता है। श्वसन तंत्र के कार्य को उत्तेजित करने के लिए, मध्यम और उच्च तीव्रता के अभ्यास का उपयोग किया जाता है। ऐसे मामलों में जहां यह उत्तेजना दिखाई नहीं दे रही है, कम तीव्रता के अभ्यास लागू होते हैं। यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि असामान्य समन्वय अभ्यास का अभ्यास सांस लेने की ताल में परेशानी पैदा कर सकता है; आंदोलनों और सांस लेने की ताल का सही संयोजन केवल आंदोलनों की बार-बार दोहराव के बाद स्थापित किया जाएगा। तेज गति से अभ्यास करने से श्वास और फुफ्फुसीय वेंटिलेशन की आवृत्ति में वृद्धि होती है, इसके साथ कार्बन डाइऑक्साइड (हाइपोकैपिया) के बढ़ते लीचिंग और प्रदर्शन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
      विशेष अभ्यास श्वसन मांसपेशियों को मजबूत करते हैं, छाती और डायाफ्राम की गतिशीलता में वृद्धि करते हैं, फुफ्फुसीय आसंजनों को फैलाने में योगदान देते हैं, शुक्राणु को हटाने, फेफड़ों में भीड़ को कम करने, श्वसन की तंत्र में सुधार और। सांस लेने और आंदोलनों का समन्वय। नैदानिक ​​डेटा की आवश्यकताओं के अनुसार व्यायाम का चयन किया जाता है। उदाहरण के लिए, छाती के निचले वर्गों में pleurodiaphragmatic आसंजन को फैलाने के लिए, शरीर एक गहरी सांस के साथ संयोजन में एक स्वस्थ दिशा में झुकता है; छाती के पार्श्व खंडों में, शरीर एक गहरी निकासी के साथ संयोजन में एक स्वस्थ दिशा में झुकता है। निकास निकासी और जल निकासी शुरू करने की स्थिति श्वसन पथ से शुक्राणु और पुस को हटाने को बढ़ावा देना। फुफ्फुसीय ऊतक की लोच को कम करने के लिए, फुफ्फुसीय वेंटिलेशन में सुधार करने के लिए, लंबे समय तक निकास के साथ अभ्यास छाती और डायाफ्राम की गतिशीलता में योगदान देना।
    श्वसन मांसपेशियों के प्रभाव में श्वास के दौरान विशेष अभ्यास करते समय, छाती पूर्ववर्ती, अग्रवर्ती और लंबवत दिशाओं में फैली हुई होती है। चूंकि वेंटिलेशन असमान है, अधिकांश हवा फेफड़ों के हिस्सों में छाती और डायाफ्राम के अधिकांश मोबाइल क्षेत्रों के निकट प्रवेश करती है, फेफड़ों के शीर्ष और फेफड़ों की जड़ के पास के अनुभाग खराब हवादार होते हैं। प्रारंभिक सुप्रीम स्थिति में अभ्यास करते समय, फेफड़ों के बाद के क्षेत्रों में वेंटिलेशन खराब हो जाता है, और प्रारंभिक स्थिति में इसके पक्ष में झूठ बोलते हुए, निचले पसलियों की गतिविधियों को लगभग बाहर रखा जाता है।
     यह देखते हुए कि फेफड़ों का असमान वेंटिलेशन श्वसन तंत्र की बीमारियों में विशेष रूप से स्पष्ट है, फेफड़ों के विभिन्न हिस्सों में वेंटिलेशन में सुधार के लिए आवश्यक होने पर विशेष श्वास अभ्यास का उपयोग किया जाना चाहिए। फेफड़ों के शीर्ष की बढ़ी हुई वेंटिलेशन बेल्ट पर हाथ की शुरुआती स्थिति में हाथों के साथ अतिरिक्त आंदोलनों के बिना गहरी सांस लेने से प्राप्त की जाती है। फेफड़ों के पीछे का बेहतर वेंटिलेशन बढ़ाया डायाफ्रामेटिक श्वसन द्वारा प्रदान किया जाता है। फेफड़ों के निचले हिस्सों में बढ़ी हुई वायु प्रवाह को डायाफ्रामैमैटिक सांस लेने में व्यायाम से बढ़ावा दिया जाता है, सिर को उठाने, कंधे उठाने, हाथों को ऊपर या ऊपर उठाने के साथ, शरीर को विस्तारित किया जाता है। श्वास अभ्यास जो फेफड़ों के वेंटिलेशन को बढ़ाते हैं, थोड़ा ऑक्सीजन खपत में वृद्धि करते हैं।
      श्वास अभ्यास का इलाज करते समय, कई नियमितताओं को ध्यान में रखना आवश्यक है। छाती गुरुत्वाकर्षण की क्रिया के तहत श्वास की मांसपेशियों को आराम करते समय सामान्य निकास किया जाता है। धीरे-धीरे इन मांसपेशियों के काम के लिए एक गतिशील निचले स्तर के साथ निकास होता है। दोनों मामलों में फेफड़ों से हवा को हटाने मुख्य रूप से फेफड़ों के ऊतकों की लोचदार ताकतों के कारण होता है। जबरन समाप्ति उत्तेजना पैदा करने वाली मांसपेशियों के संकुचन के साथ होती है। प्रवर्धन साँस छोड़ना सिर आगे झुकाव हासिल की, मिश्रण हथियार, कम करने हथियार,, शरीर तह पैर आगे उठाने और एम। एन आवश्यक अतिरिक्त फेफड़ों में सांस लेने के व्यायाम घावों प्रारंभिक स्थिति में आयोजित की जाती हैं, तो रोगी की ओर से छाती की गतिशीलता सीमित है (जैसे, रोगी पक्ष पर झूठ बोल रही द्वारा )। सांस लेने के अभ्यास की सहायता से, आप मनमाने ढंग से श्वास की आवृत्ति को बदल सकते हैं। अधिकांश अन्य किसी भी धीमा श्वसन दर में इस्तेमाल किया अभ्यास (इन मामलों में सबसे अच्छा प्रभाव के लिए यह "अपने आप" गिनती करने के लिए सिफारिश की है), यह हवा के वेग को कम कर देता है और श्वसन तंत्र के माध्यम से इसके पारित होने के लिए प्रतिरोध कम कर देता है। बढ़ी हुई सांस लेने से वायु आंदोलन की गति बढ़ जाती है, लेकिन इससे श्वसन मांसपेशियों का प्रतिरोध और तनाव बढ़ जाता है। वृद्धि हुई प्रश्वसनीय या निःश्वास के संकेत साँस लेने के व्यायाम के दौरान इस प्रकार जब मनमाने ढंग से श्वास लेते और निकालते के बीच समय के अनुपात बदल (ताकि प्रवर्धन साँस छोड़ना - इसकी अवधि बढ़ाने के लिए)।घातक मांसपेशी ट्यूमर के साथ गंभीर पुरानी बीमारियों के साथ, अधिकांश बीमारियों के तीव्र चरण में उपचारात्मक शारीरिक संस्कृति का उल्लंघन किया जाता है।
निष्कर्ष।
उपर्युक्त सभी से और हमारे जीवन में श्वसन तंत्र की भूमिका पर प्रतिबिंबित करने से, हम अपने अस्तित्व में इसके महत्व के बारे में निष्कर्ष निकाल सकते हैं।जीव की महत्वपूर्ण गतिविधि की सभी प्रक्रियाएं श्वसन की प्रक्रिया पर निर्भर करती हैं। श्वसन प्रणाली के रोग बहुत खतरनाक हैं और एक गंभीर दृष्टिकोण और रोगी की पूरी वसूली की आवश्यकता है। ऐसी बीमारियों को लॉन्च करने से मृत्यु सहित गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
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ऑक्सीजन एकमात्र पदार्थ है जिस पर हमारा जीवन पूरी तरह से निर्भर करता है। प्रत्येक श्वास के साथ, निकालने के दौरान शरीर को ऑक्सीजन प्राप्त होता है, यह कार्बन डाइऑक्साइड बाय-प्रोडक्ट को हटा देता है। इस जीवन देने वाले गैस एक्सचेंज को सांस लेने कहा जाता है।सभी जीवित ऊतकों को ऊर्जा के निरंतर स्रोत की आवश्यकता होती है, जो ईंधन (कार्बोहाइड्रेट, वसा या प्रोटीन) जलाने से उत्पन्न होता है। ईंधन जलता है, ऑक्सीजन के साथ संयोजन, जो श्वास के दौरान शरीर में प्रवेश करता है और सभी कोशिकाओं में रक्त वाहिकाओं के माध्यम से किया जाता है।ऑक्सीजन (ऑक्सीकरण) के दहन से, तीन अंतिम उत्पाद बनते हैं - ऊर्जा, पानी और कार्बन डाइऑक्साइड। शरीर से अपशिष्ट कार्बन डाइऑक्साइड के उन्मूलन के साथ गैस एक्सचेंज की प्रक्रिया शुरू होती है। रक्त फेफड़ों में स्थानांतरित करता है, वहां से यह बाहरी वातावरण में लौटता है, और इसके स्थान पर ऑक्सीजन का एक नया हिस्सा श्वास लेता है। श्वसन प्रक्रिया बहुत प्रभावी ढंग से विनियमित होती है, इसलिए रक्त में गैसों की एकाग्रता बहुत ही सीमित सीमाओं के भीतर बनाए रखा जाता है, जो आपके स्वास्थ्य की गारंटी के रूप में कार्य करता है।
ऑक्सीजन की आवश्यकता जीव की गतिविधि की डिग्री के आधार पर भिन्न होती है। उदाहरण के लिए, आराम से एक साधारण वयस्क व्यक्ति प्रति मिनट 3.75 लीटर हवा में सांस लेता है। इस मात्रा में लगभग 750 सेमी है? ऑक्सीजन, जो लगभग 1/3 द्वारा अवशोषित है। आदमी को बस के बाद जाने दो, मांसपेशियों को अधिक ऑक्सीजन की आवश्यकता होगी, जिसके लिए आपको 15 गुना अधिक हवा में श्वास लेना होगा। ऑक्सीजन खपत लगभग 30 गुना हो सकती है।चूंकि गतिविधि की डिग्री के आधार पर शरीर को ऑक्सीजन की अलग-अलग मात्रा की आवश्यकता होती है, इसलिए हम फेफड़ों की आंतरिक संरचना और विशेष रूप से अलवेली द्वारा प्रदान की गई महत्वपूर्ण आरक्षित क्षमता के बिना नहीं कर सकते हैं। हम फेफड़ों को सांस लेने और रक्त की आपूर्ति की आवृत्ति और गहराई के बीच निरंतर संतुलन के बिना नहीं कर सकते हैं।श्वास कम, आवेगपूर्ण श्वास और शिशु की पहली रोना, अल्वेली और फेफड़ों की प्रकृति के साथ शुरू होता है जो चिकनाई के लिए होता है। जन्म से पहले, भ्रूण को प्लेसेंटा के माध्यम से मां से ऑक्सीजन प्राप्त होता है। शिरापरक नली के माध्यम से यकृत या अवरक्त वीना कैवा में प्रवेश करने वाला खून ऑक्सीजन में समृद्ध होता है, लेकिन शरीर के अन्य हिस्सों में यह न तो ऑक्सीजन से पूरी तरह से संतृप्त होता है और न ही समाप्त हो जाता है।सही आलिंद में प्रवेश करने वाले अधिकांश रक्त को अंडाकार खिड़की के माध्यम से बाईं ओर स्थानांतरित किया जाता है, जो जन्म के बाद बंद हो जाता है। दाएं वेंट्रिकल में प्रवेश करने वाला रक्त मुख्य रूप से धमनियों के नलिका के माध्यम से निकल जाता है।
       जन्म के क्षण तक, फेफड़ों के लिए रक्त की आपूर्ति महत्वहीन होती है, उनमें कोई हवा नहीं होती है, और वे काम नहीं करते हैं (बाएं आरेख देखें)। जन्म के बाद, प्लेसेंटा के माध्यम से ऑक्सीजन की आपूर्ति समाप्त हो जाती है, लेकिन पहली रोना फेफड़ों को सीधा करती है, और वे काम करना शुरू करते हैं (सही आरेख देखें)। धमनी नली की अब आवश्यकता नहीं है और जल्द ही अपने आप बंद हो जाता है।

श्वसन अंग

जब आप श्वास लेते हैं, हवा पहले ऊपरी श्वसन पथ में प्रवेश करती है - नाक और मौखिक गुहा, जो एक दूसरे से जुड़े होते हैं और एक दरवाजे की तरह, एक दूसरे से नरम आकाश से अलग होते हैं। मुंह और नाक के म्यूकोसा नमी और हवा चला इससे पहले कि यह फेफड़ों और नाक गुहा इसके अलावा पतली बाल, जो धूल सुलझेगी के साथ कवर किया जाता है।मुख्य ब्रोंची फेफड़ों से जुड़ा हुआ है, जहां उन्हें बार-बार छोटे माध्यमिक ब्रोंची में विभाजित किया जाता है, जो फेफड़ों के प्रत्येक लोब के लिए होता है। कुछ लोग (डॉक्टरों को छोड़कर, निश्चित रूप से) इस तथ्य को जानते हैं कि बाएं फेफड़ों में दो लोब हैं, और दाहिने फेफड़े में तीन हैं। जैसे-जैसे वे अलग होते हैं और छोटे होते हैं, ब्रोंची प्राथमिक होते हैं और फिर टर्मिनल ब्रोंचीओल्स, जो अल्वेली के छोटे वायु कोशिकाओं में समाप्त होते हैं, कई डिब्बे में विभाजित होते हैं।ब्रोंची और ब्रोंचीओल्स को फुफ्फुसीय धमनी की शाखाओं से रक्त के साथ आपूर्ति की जाती है जो दिल के दाएं वेंट्रिकल से फेफड़ों तक ऑक्सीजन-खराब रक्त लेती है। कई कैशिलरी में धमनी कांटा जिसके माध्यम से रक्त अल्वेली तक पहुंचता है। शरीर की जटिल संरचना में छोटे वाहक जीवन - - लाल रक्त कोशिकाओं के सूक्ष्म बुलबुले की पतली दीवार के माध्यम से कब्जा हवा और ऑक्सीजन से लिया कार्बन डाइऑक्साइड दे।
रक्त, गैस विनिमय की वजह से ऑक्सीजन के साथ समृद्ध फुफ्फुसीय नसों में प्रवेश करती है और, अंततः, दिल के बाएं निलय में, और शरीर के विभिन्न अंगों से पंप किया जाता है।फेफड़ों को घिरा हुआ है और फुफ्फुस की एक डबल परत झिल्ली से संरक्षित है। इसकी परतों के बीच एक संकीर्ण लुमेन या फुफ्फुसीय गुहा होता है जिसमें द्रव की थोड़ी मात्रा होती है। यह द्रव एक स्नेहक के रूप में कार्य करता है जो प्रत्येक श्वास के साथ छाती पर फेफड़ों की सतह के घर्षण को रोकता है।मांसपेशियों के दो समूह श्वसन की प्रक्रिया में भाग लेते हैं। ये पसलियों के बीच अंतराल को भरने वाली इंटरकोस्टल मांसपेशियां हैं, और डायाफ्राम एक व्यापक फ्लैट मांसपेशी है जो छाती कोशिका और पेट की गुहा को अलग करता है। फेफड़ों में प्रवेश करने के लिए हवा के लिए, उनके अंदर का दबाव वायुमंडलीय से नीचे होना चाहिए। डायाफ्राम अनुबंध, इंटरकोस्टल मांसपेशियों में फेफड़ों के लिए जगह का विस्तार, और फेफड़ों के लिए जगह का विस्तार, और वायुमंडलीय हवा दुर्लभ क्षेत्र में जाती है।फेफड़ों के प्रदर्शन को व्यायाम के दौरान श्वास वाली हवा की मात्रा को मापकर और निकाला जा सकता है। फेफड़े की मात्रा फिटनेस का एक प्रमुख संकेतक है।

बिना शर्त प्रतिबिंब

श्वसन एक प्रतिबिंब क्रिया है जिसे श्वसन केंद्र या मस्तिष्क के निचले हिस्से में स्थित तंत्रिका कोशिकाओं के समूह द्वारा नियंत्रित किया जाता है। यहां से, तंत्रिका आवेग श्वसन मांसपेशियों को भेजा जाता है, जिससे उन्हें विस्तार या अनुबंध होता है और ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड और रक्त के स्तर पर निर्भर करता है। अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड क्षारीय रक्त प्रतिक्रिया को कम करता है, श्वसन केंद्र को उत्तेजित करता है, और आप अधिक कार्बन डाइऑक्साइड को निकालने, तेजी से और गहरी सांस लेने लगते हैं। इसकी कमी के साथ, आपका सांस उथला हो जाता है और संतुलन बहाल होने तक धीमा हो जाता है।

संदर्भ

इस काम की तैयारी के लिए साइट probel.km.ru/ से सामग्री का उपयोग किया गया था शरीर को श्वसन के दौरान ऑक्सीजन प्राप्त होता है। श्वसन अंगों में नाक गुहा, लारेंक्स, ट्रेकेआ, ब्रोंची और फेफड़े शामिल हैं। क्रम में उन पर विचार करें। खोपड़ी और उपास्थि के चेहरे के हिस्से की हड्डियों द्वारा बनाई गई नाक गुहा को एक श्लेष्म झिल्ली के साथ रेखांकित किया जाता है, जिसे कई बाल और कोशिकाओं द्वारा बनाया जाता है जो नाक गुहा को ढंकते हैं। बाल हवा से धूल के कणों को रोकते हैं, और श्लेष्मा रोगाणुओं के प्रवेश को रोकता है। श्लेष्म झिल्ली में प्रवेश करने वाले रक्त वाहिकाओं के लिए धन्यवाद, नाक गुहा के माध्यम से गुजरने वाली हवा, साफ, मॉइस्चराइज और गर्म हो जाती है
नासोफैरेनिक्स के माध्यम से, हवा उपास्थि द्वारा बनाई गई लारेंक्स में प्रवेश करती है, जो अस्थिबंधन और मांसपेशियों से जुड़ी होती है। यहां मुखर तार हैं, जिसकी कंपन हवा के पारित होने के दौरान ध्वनि के गठन का कारण बनती है।फिर हवा 10-14 सेमी लंबी ट्यूब के रूप में ट्रेकेआ में प्रवेश करती है। कार्टिलेजिनस के छल्ले जो इसकी दीवारें बनाते हैं, हवा को गर्दन की गति के दौरान हवा में रहने की अनुमति नहीं देते हैं। ट्रेकेआ के निचले हिस्से में दो ब्रोंची में बांटा गया है, जो दाएं और बाएं फेफड़ों में शामिल हैं। यहां वे ब्रोंचीओल्स पर शाखा बनाते हैं और फुफ्फुसीय vesicles (alveoli) के साथ खत्म होता है। ब्रोंचीओल्स और अल्वेली दो फेफड़ों का निर्माण करते हैं। फेफड़ों में, 300 मिलियन से अधिक अलवेली हैं।
     फेफड़ों में फुफ्फुसीय परिसंचरण की धमनियां शिरापरक रक्त में प्रवेश करती हैं, जो ऑक्सीजन से समृद्ध होती है और धमनी बन जाती है। उसी समय, कार्बन डाइऑक्साइड से शिरापरक रक्त जारी किया जाता है, जो फुफ्फुसीय vesicles में प्रवेश करता है और निकास के दौरान शरीर से हटा दिया जाता है।
इसके अलावा, रक्त परिसंचरण के महान चक्र के जहाजों के माध्यम से धमनी रक्त शरीर के अंगों की ओर बढ़ता है और ऑक्सीजन के साथ अपने ऊतकों को समृद्ध करता है। सेल महत्वपूर्ण प्रक्रियाओं के लिए ऑक्सीजन आवश्यक है। यह रक्त में ऊतकों की कोशिकाओं से कार्बन डाइऑक्साइड पैदा करता है, जिसके परिणामस्वरूप धमनी से रक्त शिरापरक हो जाता है। फेफड़ों में हवा का सेवन श्वसन आंदोलनों के परिणामस्वरूप स्वचालित रूप से तंत्रिका तंत्र के प्रभाव में होता है - इनहेलेशन और निकास, जो इंटरकोस्टल मांसपेशियों और डायाफ्राम (छाती और पेट की गुहा को अलग करने वाली मांसपेशी सेप्टम) की मदद से किया जाता है।
श्वसन गिरफ्तारी दुर्घटनाओं के कारण मौत के आम कारणों में से एक है, जैसे डूबने। घायल व्यक्ति को पानी से बाहर निकाला जाना चाहिए, मुंह और नाक गुहाओं को रेत और श्लेष्म से साफ़ किया जाना चाहिए, और पेट और वायुमार्ग को पानी से मुक्त किया जाना चाहिए। फिर आपको कृत्रिम श्वसन के लिए आगे बढ़ने की जरूरत है।कृत्रिम श्वसन का उद्देश्य तुरंत प्रभावित फेफड़ों को हवा से भरना है (यहां तक ​​कि किसी व्यक्ति द्वारा निकाली गई हवा में सांस लेने के लिए पर्याप्त ऑक्सीजन होता है)। पीड़ित के मुंह में बाहर निकलने पर, सुनिश्चित करें कि उसकी छाती उगती है; अन्यथा, आपकी हवा बस लक्ष्य तक नहीं पहुंचती है। निकास हर पांच सेकंड में किया जाना चाहिए; यदि कोई व्यक्ति प्रति मिनट 10 से अधिक सांसों को स्वतंत्र रूप से करने लगता है तो श्वास बहाल किया गया था।
      कृत्रिम श्वसन अक्सर अप्रत्यक्ष हृदय मालिश के साथ होता है। इसका उद्देश्य शरीर के माध्यम से रक्त परिसंचरण को बहाल करना है: हृदय के किसी भी संकुचन से यह जहाजों के माध्यम से आगे बढ़ने का कारण बनता है जैसे कि दिल अपने आप को धड़कता है। अगर किसी व्यक्ति के पास नाड़ी नहीं है, तो उसे अपनी पीठ पर रखें, छाती के निचले हिस्से में पसलियों के कोण को महसूस करें, हड्डी के निचले किनारे पर हथेली का आधार रखें (किनारों से दो अंगुलियों की चौड़ाई पर)। अपने हथेली को अन्य हथेली से ढकें, आगे बढ़ो ताकि आप स्टर्नम से ऊपर हों, और अपनी सीधी बाहों के साथ हथेली पर अपना वजन बढ़ाएं। छाती को 1 सेकंड के अंतराल के साथ लगभग 15 बार दबाएं ताकि यह 4-5 सेमी (बच्चे में - 2.5-4 सेमी तक) तक गिर जाए। क्लिक की श्रृंखला के बाद दो बार प्रभावित हवा को मुंह में श्वास लेते हैं, फिर दिल की मालिश जारी रखें। हर 3 मिनट, अपनी गर्दन में नाड़ी की उपस्थिति की जांच करें। जब त्वचा अपने स्वस्थ रंग में लौटती है, नाड़ी और स्वतंत्र श्वास फिर से शुरू होती है, तो हम मान सकते हैं कि लक्ष्य हासिल किया गया है।
श्वसन प्रणाली
सांस
बाहरी श्वसन को अलग करें - प्रक्रियाओं का एक सेट जो शरीर में ऑक्सीजन का प्रवाह सुनिश्चित करता है और कार्बन डाइऑक्साइड, सेलुलर, या ऊतक श्वसन को हटाने - ऑक्सीजन का उपयोग सेल   और कपड़े   कोशिकाओं की महत्वपूर्ण गतिविधि के लिए आवश्यक ऊर्जा की रिहाई के साथ जैविक पदार्थों के ऑक्सीकरण के लिए। श्वास मानव कोशिकाओं, जानवरों, पौधों, कवक और कई सूक्ष्मजीवों की विशेषता है। श्वसन के प्रकार के आधार पर, एरोबिक और एनारोबिक सूक्ष्मजीवों को प्रतिष्ठित किया जाता है, उनमें से कई एक प्रकार के श्वसन से दूसरे में स्थानांतरित करने में सक्षम होते हैं।
इन प्रक्रियाओं का आणविक आधार कार्बनिक अणुओं में कार्बन का सीओ 2 और पानी के चरणबद्ध ऑक्सीकरण है। सेलुलर ईंधन की मुक्त ऊर्जा एटीपी फॉस्फेट बॉन्ड की ऊर्जा के रूप में संग्रहित होती है (एडेनोसाइन ट्राइफॉस्फेट एसिड देखें (एटीपी)।   जारी करने के लिए कोशिका द्वारा जारी ऊर्जा का उपयोग किया जाता है: पदार्थों के सक्रिय परिवहन के माध्यम से झिल्ली,   यांत्रिक आंदोलन, नए यौगिकों का संश्लेषण इत्यादि।
यूकेरियोटिक सेल की मुख्य संरचनाएं, जहां श्वसन होता है, - mitohondrsh   में प्रोकैर्योसाइटों   कोई mitochondria, और एक एंजाइम   श्वसन गैर-कोशिका झिल्ली के अंदर स्थित होता है।
सांस लेने की प्रक्रिया में कई चरणों होते हैं।
हाइड्रोलिसिस पहले होता है। कार्बोहाइड्रेट, एमिनो एसिड,   वसा ऑक्सीडेटिव ब्रेकडाउन के अधीन हैं। ऑक्सीकरण ग्लूकोज के एनोक्सिक विभाजन के साथ शुरू होता है। ग्लाइकोलाइसिस। ग्लाइकोलिसिस एक्सचेंज उत्पादों को तथाकथित क्रेब्स चक्र में शामिल किया जाता है - लगातार जैव रासायनिक प्रतिक्रियाओं का एक बंद चक्र। उसी समय, सीओ 2 और हाइड्रोजन (प्रोटॉन + इलेक्ट्रॉन) बनते हैं। कोशिका से सीओ 2 हटा दिया जाता है और हाइड्रोजन "श्वसन श्रृंखला" में जाता है - हाइड्रोजन और इलेक्ट्रॉनों के हस्तांतरण की लगातार प्रतिक्रियाओं की एक श्रृंखला। "श्वसन श्रृंखला" की सेवा करने वाले एंजाइम आंतरिक माइटोकॉन्ड्रियल झिल्ली पर स्थित होते हैं। इस श्रृंखला में हाइड्रोजन और इलेक्ट्रॉनों के हस्तांतरण के दौरान जारी ऊर्जा ऑक्सीडेटिव फॉस्फोरिलेशन के दौरान एटीपी बनाने के लिए प्रयोग की जाती है। माइटोकॉन्ड्रिया के अंदर बना एटीपी अणुओं को साइटप्लाज्म में स्थानांतरित कर दिया जाता है; एडीपी (एडेनोसाइन डिफॉस्फोरिक एसिड) अणुओं के लिए मिटोकॉन्ड्रिया के बाहर आदान-प्रदान के लिए आदान-प्रदान।
एरोबिक कोशिकाएं सांस लेने के माध्यम से अपनी अधिकांश ऊर्जा प्राप्त करती हैं। यह एक बहुत मुश्किल है, लेकिन सबसे किफायती तरीका है। जब ग्लूकोज ऑक्सीकरण होता है, ऊर्जा को एनारोबिक पाचन से 13 गुना अधिक जारी किया जाता है। एनोक्सिक विभाजन I में, एटीपी के 2 अणुओं को ग्लूकोज द्वारा संश्लेषित किया जाता है, जबकि ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में ग्लूकोज के 1 अणु को विभाजित करते हुए, एटीपी के 36 मोल बनते हैं, यानी। 18 गुना अधिक!कोशिकाओं से ऊर्जा प्राप्त करने के लिए ऑक्सीजन मुक्त तरीका अधिक प्राचीन है। बाद में पृथ्वी पर श्वास उठ गया, जब ऑक्सीजन अपने वायुमंडल में दिखाई दिया।

श्वसन प्रणाली

जानवरों के भारी बहुमत में ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है, क्योंकि कार्बन डाइऑक्साइड की रिहाई के साथ ऑक्सीडेटिव प्रक्रियाओं के कारण उनकी महत्वपूर्ण गतिविधि के लिए आवश्यक ऊर्जा का गठन होता है।
शरीर में ऑक्सीजन का प्रवाह और कार्बन डाइऑक्साइड को हटाने से श्वसन प्रक्रियाओं के कारण होता है।
यूनिकेल्युलर जानवरों में श्वसन का सबसे सरल रूप सतह के माध्यम से गैसों के प्रसार से होता है। कोशिकाओं।
बहुकोशिकीय जानवरों में, विभिन्न प्रकार के श्वसन तंत्र बनते हैं। तो, स्पंज और कीड़े त्वचा सांस लेने लगते हैं। ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड पानी में अच्छी तरह से भंग हो जाते हैं और गैसों की कम एकाग्रता की दिशा में आसानी से शरीर की गीली सतह से गुजरते हैं।
कीड़ों में चिटिनस कवर के विकास ने त्वचा श्वसन को समाप्त कर दिया और ट्राइकल श्वसन तंत्र (चित्र 1) का गठन किया। यह बेहतरीन ट्यूबों की एक प्रणाली है जो सभी कोशिकाओं और ऊतकों तक पहुंचती है। ट्यूबों के माध्यम से, बाहरी वातावरण से ऑक्सीजन ऊतकों में प्रवेश करता है, और कार्बन डाइऑक्साइड वापस आ जाता है। अधिकांश जलीय जानवरों ने गिल सांस लेने का विकास किया। गिलों की एक बड़ी सतह होती है और अपेक्षाकृत छोटी मात्रा में पानी में भंग ऑक्सीजन को पर्याप्त रूप से अवशोषित कर सकती है (पानी के 1 एल में सीओ का 5-7 मिलीलीटर)। 1 लीटर हवा में 210 मिलीलीटर ऑक्सीजन होता है। इसलिए, अधिकांश स्थलीय कशेरुकाओं में, उभयचर से शुरू होने पर, फुफ्फुसीय श्वसन का मुख्य प्रकार बन जाता है, हालांकि उभयचर में 50% आवश्यक ऑक्सीजन त्वचा द्वारा अवशोषित हो जाता है।
पक्षियों में भी हवा की थैली होती है - फेफड़ों की बढ़ती, खोखले हड्डियों (चित्र 2) में आंतरिक अंगों के बीच स्थित होती है। पक्षियों में गैस एक्सचेंज इनहेलेशन और निकास के दौरान होता है, जब हवा फेफड़ों के माध्यम से हवा के बैग और पीछे जाती है।फेफड़ों की श्वसन सतह में बड़ी वृद्धि के कारण स्तनधारियों के सांस लेने से उच्चतम पूर्णता प्राप्त की गई है। मनुष्यों में, यह 90-100 मीटर 2 है।मानव श्वसन पथ में नाक और मौखिक गुहा, नासोफैरेनिक्स, लारेंक्स, ट्रेकेआ, ब्रोंची (चित्र 3) शामिल होते हैं। नाक गुहा में, श्वास वाली हवा गर्म, गीली और साफ होती है। यह वायुमार्ग और फेफड़ों को बीमारियों से बचाता है।

अंजीर। 3. मानव श्वसन तंत्र: 1 -   नाक गुहा; 2 -   nasopharynx; 3 -   गला; 4 -   श्वासनली; 5 - ब्रोंची; 6 -   ब्रोन्कियल sprigs; 7 - फुफ्फुसीय pleura; 8 -   प्रिस्ट - रात pleura; 9 -   फेफड़े; .1 0 -   फुफ्फुसीय vesicles - alveoli; II -   फुफ्फुसीय परिसंचरण के रक्त केशिकाएं।
फेफड़ों में फुफ्फुसीय बोरे होते हैं, जो अंधा कोशिकाओं - अल्वेली में समाप्त ब्रोंचीओल्स द्वारा गठित होते हैं। प्रत्येक अलौकिक रक्त केशिकाओं के घने नेटवर्क से ब्रेक किया जाता है। गैस एक्सचेंज अलवेली और केशिकाओं की दीवारों के माध्यम से होता है। प्रत्येक फेफड़े को दो चादरों से युक्त फुफ्फुस की एक झिल्ली से ढका हुआ होता है। यह एक बंद, पतला-जैसे फुफ्फुसीय गुहा बनाता है, क्योंकि आंतरिक पत्ती फेफड़ों को ढकती है और बिना रुकावट के बाहरी पत्ते में गुजरती है जो कि पसलियों के पिंजरे को अंदर रखती है। गुहा के अंदर तरल की एक छोटी मात्रा होती है, जो एक-दूसरे के सापेक्ष पत्तियों की स्लाइडिंग को सुविधाजनक बनाता है। फुफ्फुसीय गुहा के अंदर दबाव हमेशा नकारात्मक होता है, यानी। वायुमंडलीय नीचे।
श्वास के दौरान छाती की मात्रा में परिवर्तन श्वसन इंटरकोस्टल मांसपेशियों और डायाफ्राम की कमी के कारण होता है। यह बदले में, इस तथ्य की ओर जाता है कि फुफ्फुस की बाहरी नाली आंतरिक रूप से आंतरिक से विचलित हो जाती है। फुफ्फुसीय गुहा थोड़ा बढ़ता है, इसमें दबाव गिर जाता है, जो लोचदार फेफड़े के ऊतकों को फैलाता है। फेफड़ों की मात्रा में वृद्धि से उनमें दबाव में कमी आती है, और बाहरी हवा फेफड़ों में चूस जाती है। इस तरह सांस जाती है आराम से, निकास निष्क्रिय होता है। गुरुत्वाकर्षण की क्रिया के तहत पसलियों में उतरते हैं, आंतरिक अंगों का डायाफ्राम दबाव बढ़ता है, और छाती की मात्रा कम हो जाती है। फुफ्फुसीय गुहा और फेफड़े कुछ हद तक संपीड़ित होते हैं, और फुफ्फुसीय हवा निकलती है। बढ़ी हुई समाप्ति विलुप्त होने वाली मांसपेशियों में कमी के कारण होती है।पुरुषों में अधिकतम श्वास (फेफड़ों की क्षमता) के बाद अधिकतम समाप्ति मात्रा सामान्य है 4.8 एल, महिलाओं में 3.3 एल। एथलीटों में, उच्च योग्यता के धावक, यह 8.0 लीटर के बराबर है।
     फुफ्फुसीय गैस एक्सचेंज की प्रभावशीलता श्वसन आंदोलनों की तीव्रता और श्वास वाली हवा की संरचना पर निर्भर करती है। रोइंग, तैराकी, दौड़ना, ताजा हवा में व्यायाम, फुफ्फुसीय वेंटिलेशन को बढ़ावा देना,पल्मोनरी गैस एक्सचेंज अलौकिक हवा में ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड के आंशिक दबाव में अंतर के कारण अलौकिक बुलबुले की सबसे पतली दीवारों के माध्यम से होता है और उनके वोल्टेज में रक्त (   आकृति 4)।
गैस मिश्रण में गैस का आंशिक, या आंशिक, दबाव गैस के प्रतिशत और कुल दबाव के अनुपात के समान होता है। वायुमंडलीय हवा में ऑक्सीजन का प्रतिशत लगभग 21% है। 760 मिमी एचजी के वायु दाब के साथ। कला। ऑक्सीजन का आंशिक दबाव (760 - 21) / 100zh159 मिमी एचजी है। कला।अलवीय हवा जल वाष्प से संतृप्त होती है, इसमें ऑक्सीजन 14% है, इसलिए अलवीय हवा में ऑक्सीजन का आंशिक दबाव «100-110 मिमी एचजी है। कला।रक्त में, गैस एक विघटित और रासायनिक रूप से बंधे राज्य में हैं। केवल प्रसारित गैस अणु प्रसार में शामिल होते हैं। एक तरल में एक गैस का वोल्टेज बल है जिसके साथ विघटित गैस के अणु गैसीय माध्यम में प्रवेश करते हैं। यह बल रक्त में गैस के प्रतिशत पर निर्भर करता है। यह स्थापित किया गया है कि शिरापरक रक्त में ऑक्सीजन तनाव 40 मिमी एचजी है। कला। डिफ्यूजन प्रेशर (100-40 = 60 मिमीएचजी। सेंट) रक्त में ऑक्सीजन के तेज़ स्थानांतरण में योगदान देता है, जहां यह ऑक्सीमोग्लोबिन बनाने, हीमोग्लोबिन के साथ घुल जाता है और जोड़ता है। इस रूप में, ऊतकों को ऑक्सीजन दिया जाता है।ऊतकों में कार्बन डाइऑक्साइड का अधिकतम वोल्टेज 60 है, शिरापरक रक्त में 47 मिमी एचजी है। कला।, 40 मिमी एचजी की अलवीय हवा में आंशिक दबाव। कला। शिरापरक रक्त में कार्बन डाइऑक्साइड का हिस्सा हीमोग्लोबिन और कार्बोनिक एसिड लवण के साथ एक यौगिक के रूप में ले जाया जाता है।
फुफ्फुसीय capillaries का उपयोग कर एक एंजाइम   रासायनिक यौगिकों से कार्बन डाइऑक्साइड तेजी से साफ़ किया जाता है और प्रसार दबाव (47-40 = 7 मिमीएचजी) के कारण यह अलौकिक में जाता है, और फिर, जब आप वायुमंडलीय हवा में बाहर निकलते हैं।फेफड़ों के माध्यम से रक्त के प्रवाह के दौरान, इसमें गैसों का तनाव फेफड़ों के आंशिक दबाव के साथ लगभग लगभग तुलना की जाती है। गैसों के समान प्रसार केवल ऊतक केशिकाओं में विपरीत दिशा में होता है: ऑक्सीजन रक्त में ऊतकों, कार्बन डाइऑक्साइड में प्रवेश करती है।
सामान्य वायुमंडलीय दबाव की स्थिति के तहत, रक्त प्लाज्मा (ओ 2, सीओ 2, एन 2) में गैसों की एक छोटी मात्रा को हमेशा भंग कर दिया जाता है, इन घुलनशील गैसों में सांस लेने को प्रभावित नहीं होता है। लेकिन जब पहाड़ों में चढ़ते हैं, अंतरिक्ष में उड़ानों में पानी में डुबोया जाता है, तो रक्त प्लाज्मा में घुलनशील गैसों के प्रभाव को ध्यान में रखना आवश्यक है। उदाहरण के लिए, जब डाइवर्स उच्च बैरोमेट्रिक दबाव की शर्तों के तहत काम करते हैं, घुलनशील नाइट्रोजन का नरक प्रभाव हो सकता है। स्कूबा डाइवर्स पर विचार करना महत्वपूर्ण है। गहरे पानी से चढ़ाई धीरे-धीरे बनाई जाती है, स्टॉप के साथ, ताकि घुलनशील गैसों को धीरे-धीरे रक्त से हटा दिया जाता है और रक्त वाहिकाओं में वायु बुलबुले नहीं बनते हैं, जो तेजी से बढ़ते हैं, रक्त परिसंचरण को परेशान कर सकते हैं। श्वसन आंदोलनों का विनियमन श्वसन केंद्र द्वारा किया जाता है, जिसे केंद्रीय तंत्रिका तंत्र के विभिन्न हिस्सों में स्थित तंत्रिका कोशिकाओं के एक सेट द्वारा दर्शाया जाता है। श्वसन केंद्र का मुख्य हिस्सा मेडुला आइलॉन्गाटा में स्थित है। इसकी गतिविधि रक्त में कार्बन डाइऑक्साइड (सीओ 2) की एकाग्रता और विभिन्न आंतरिक अंगों और त्वचा के रिसेप्टर्स से आने वाले तंत्रिका आवेगों पर निर्भर करती है।
इसलिए, नवजात शिशु में गर्भनाल के बंधन और मां के शरीर से अलग होने के बाद, कार्बन डाइऑक्साइड रक्त में जमा होता है और ऑक्सीजन की मात्रा कम हो जाती है। सीओ 2 से अधिक विनम्र है, और रक्त वाहिकाओं के रिसेप्टर्स के माध्यम से ओ 2 की कमी से श्वसन केंद्र को उत्तेजित करता है। इससे श्वसन मांसपेशियों में कमी और छाती की मात्रा में वृद्धि होती है, फेफड़ों का विस्तार होता है, पहला श्वास होता है।तंत्रिका विनियमन में सांस लेने पर एक प्रतिबिंब प्रभाव पड़ता है। त्वचा, दर्द, भय, क्रोध, खुशी, व्यायाम की गर्म या ठंडी जलन, श्वसन आंदोलनों की प्रकृति को जल्दी से बदल देती है।

निष्कर्ष

हवा की खराब धूल और गैस प्रदूषण का श्वसन तंत्र के विकास और कार्यप्रणाली पर बुरा असर पड़ता है। वे फेफड़ों में श्वसन पथ और फेफड़ों के उपकला, इसके सूखने, या अत्यधिक उदारता, क्षति या धूल के कणों के संचय के परिणामस्वरूप नुकसान पहुंचाते हैं। यह गैस एक्सचेंज को जटिल बनाता है और श्वसन रोगों का कारण बनता है - ट्रेकेइटिस, ब्रोंकाइटिस इत्यादि। यह इन स्थितियों में विशेष रूप से हानिकारक है, मुंह के माध्यम से श्वसन।श्वसन प्रणाली, तंबाकू धूम्रपान और शराब की खपत पर विनाशकारी प्रभाव। तम्बाकू धुएं में विषाक्त पदार्थ होते हैं, जैसे निकोटीन, बेंज़ोप्रीन, जो घातक ट्यूमर के विकास में योगदान देता है। धूम्रपान करने वालों को विशेष रूप से लगातार श्वसन रोग होते हैं, साथ ही होंठ के कैंसर, फेरनक्स भी होते हैं। वे गैर धूम्रपान करने वालों की तुलना में फेफड़ों के कैंसर को कई बार विकसित करते हैं।
       शराब श्वास की लय का उल्लंघन करता है, अल्वेली लोच को खो देता है और अत्यधिक विस्तार करता है, जिससे रक्त, श्लेष्म, फुफ्फुसीय edema, ब्रोंची के कार्यों के विस्तार और व्यवधान, गैस कमजोर कमजोर पड़ने से रोकता है।भरी कमरे में रहना इस तथ्य की ओर जाता है कि एक व्यक्ति जल्दी थक जाता है, उसकी याददाश्त, गति और प्रतिक्रियाओं की सटीकता बिगड़ती है। ताजा हवा में निरंतर शारीरिक कार्य, शारीरिक शिक्षा और खेल इन अवांछित घटनाओं के विकास से बचने में मदद करते हैं।गरीब मुद्रा, खराब मुद्रा, और तंग कपड़ों में सांस लेने में मुश्किल होती है, जिसके परिणामस्वरूप श्वसन आंदोलनों की सीमा, फेफड़ों को फैलाने और फुफ्फुसीय वेंटिलेशन कम हो जाते हैं। इसलिए, बचपन से अपने मुद्रा की निगरानी करने के लिए सही मुद्रा विकसित करना आवश्यक है।ऊपरी श्वसन पथ, फ्लू, गले के गले आदि के श्वसन अंगों के संक्रामक रोगों को रोकने के लिए महत्वपूर्ण है। रोकथाम के लिए, शरीर की सामान्य सख्तता में संलग्न होने के लिए हाइपोथर्मिया से बचने की सिफारिश की जाती है।

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